राजस्थान सरकार की 2014 में शुरू की गई व्यक्तिगत पालन-पोषण देखभाल योजना के तहत 70 अनाथ बच्चे अलग-अलग परिवारों में रह रहे हैं। परिवार का साथ पाकर इन बच्चों की मानसिक और शारीरिक स्थिति बदल गई है। वे पढ़ाई और खेल में बेहतर हो गए हैं। इन बच्चों ने संगीत, चित्रकला और शैक्षणिक ओलम्पियाड्स में कई मेडल जीते हैं। बाल कल्याण समिति की पूर्व अध्यक्ष डॉ. शिल्पा मेहता बताती हैं कि एक बच्ची 18 साल की होने के बाद भी अपनी मर्जी से उसी फोस्टर परिवार के साथ रह रही है, जिसने उसे बचपन में आसरा दिया था। परिवारों में भेजे गए बच्चों की हर महीने होम​ विजिट और काउंसिलिंग होती है परिवारों में भेजे गए बच्चों के घरों में हर महीने होम विजिट और काउंसिलिंग के जरिए मॉनिटरिंग की जाती है। फोस्टर पैरेंट्स बनने के लिए दो साल से राजस्थान का निवासी और आयकरदाता होना चाहिए। भावी माता-पिता की संयुक्त अधिकतम आयु 120 वर्ष होनी चाहिए, जिसमें किसी एक व्यक्ति की न्यूनतम आयु 35 वर्ष और अधिकतम 65 वर्ष से ज्यादा नहीं होनी चाहिए। आवेदक स्वस्थ होने चाहिए और कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं होना चाहिए। कोई भी एकल पुरुष बालिका को पालन-पोषण के लिए लेने का पात्र नहीं है। 18 साल की उम्र तक परिवार के साथ रहते हैं हर बच्चे के पालन-पोषण के लिए परिवार को 4 हजार रुपए हर महीने दिए जाते हैं। बच्चे को 18 वर्ष की आयु पूरी होने तक परिवार से जोड़ा जाता है। यह पूरी तरह अस्थायी है, इसमें बच्चे का संपत्ति पर कोई कानूनी अधिकार नहीं होता। बाल अधिकारिता विभाग के उपनिदेशक के.के. चंद्रवंशी ने बताया कि उदयपुर इस दिशा में बेहतरीन कार्य कर रहा है और प्रदेश में शीर्ष पर है। परिवार संग जुड़ने से बच्चे डिप्रेशन-एंग्जाइटी में नहीं जाते “अनाथ बच्चे जब किसी परिवार के साथ जुड़ते हैं तो उनमें भावनात्मक परिवर्तन आता है। वे अपने मन की बात आसानी से परिवार के सदस्यों को बता पाते हैं। उनमें डिप्रेशन-एंग्जाइटी की आशंका कम हो जाती है। साथ ही नशे की तरफ झुकाव भी कम हो जाता हैl” -डॉ. धीरज गोया, मनोचिकित्सक, उदयपुर