राजस्थान में ब्रेस्ट कैंसर के खिलाफ सबसे बड़ी लड़ाई अस्पतालों में नहीं, बल्कि गांव-ढाणी और घर-घर में जीती जा सकती है। 61 हजार आंगनबाड़ी और 55 हजार आशा सहयोगिनियां ऐसी फ्रंटलाइन कार्यकर्ता हैं, जिनकी पहुंच हर बस्ती और हर घर तक है। चूंकि महिलाएं महिलाओं के साथ सहज महसूस करती हैं तो उन्हें वे अपनी दिक्कत खुलकर बता सकती हैं। ब्रेस्ट कैंसर की शुरुआती पहचान और मरीजों को समय पर जांच के लिए प्रेरित करने की जिम्मेदारी इन वर्कर्स को दी जाए तो महिलाएं समय पर अस्पताल पहुंच सकती हैं, शुरुआती चरण में रोग की पहचान होने पर मुक्ति मिल सकती। सवा लाख महिलाओं की शक्ति के सही उपयोग के बारे में सोचा जाना चाहिए, क्योंकि ब्रेस्ट कैंसर हर साल हमारी 6000 महिलाओं को मार डालता है, कई घर उजाड़ चुका है। एसएमएस मेडिकल कॉलेज एवं स्टेट कैंसर इंस्टीट्यूट में ऐसे कई केस आए जिन्हें शुरुआत में बीमारी का अंदाजा ही नहीं था, जांच हुई तो तीसरी-चौथी स्टेज का कैंसर मिला। इनमें 18 साल की किशोरी भी है। इन रोगियों को देखने के साथ ग्राउंड लेवल पर छूट रही कमियों को एक्सपर्ट्स ने समझा है। उनका मानना है कि कैंसर में सबसे बड़ी चुनौती इलाज नहीं, बल्कि बीमारी का देर से सामने आना है। अधिकांश मरीज तब अस्पताल पहुंचते हैं, जब कैंसर काफी आगे बढ़ चुका होता है। विशेषज्ञों मानते हैं कि स्क्रीनिंग की व्यवस्था सरकार ने बनाई है, लेकिन इसमें छूट रहा गैप भरना जरूरी है। आशा सहयोगिनियों और आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को स्क्रीनिंग गाइडलाइन के अनुरूप प्रशिक्षित कर संदिग्ध मरीजों की पहचान, काउंसिलिंग और रेफरल की जिम्मेदारी दी जा सकती है। साथ ही हर सफल पहचान और रेफरल पर निश्चित प्रोत्साहन राशि या पुरस्कार तय किया जाना चाहिए, इससे कार्यकर्ताओं की भागीदारी और जवाबदेही दोनों बढ़ेंगी। हालांकि, स्वास्थ्य विभाग ने 55 हजार आंगनबाड़ी और 15 हजार एएनएम को प्रारंभिक प्रशिक्षण दिया, लेकिन यह पर्याप्त नहीं। जब तक मरीज को जांच तक पहुंचाने पर परिणाम-आधारित प्रोत्साहन (आर्थिक लाभ) नहीं मिलेगा, तब तक यह जिम्मेदारी काम का अतिरिक्त बोझ है। इन फ्रंटलाइन कार्यकर्ताओं को पूर्ण प्रशिक्षण और प्रोत्साहन देना होगा। इलाज के लिए हर जिले में प्रिवेंटिव यूनिट जरूरी ब्रेस्ट कैंसर के मामले जिस तेजी से बढ़ रहे हैं, इलाज की सुविधाएं उतनी ही कमजोर हैं। बीमारी की पुष्टि के लिए भी गिने-चुने मेडिकल कॉलेज हैं। प्रत्येक जिले में प्रिवेंटिव ऑन्कोलॉजी यूनिट विकसित की जानी चाहिए, ताकि शुरुआती जांच, परामर्श और रेफरल की सुविधा स्थानीय स्तर पर उपलब्ध हो। इससे मरीजों को समय पर इलाज मिलेगा और गंभीर अवस्था में पहुंचने वाले मामलों की संख्या कम होगी।