झालावाड़ में अरावली विरासत जन अभियान के बैनर तले देशभर से आए पर्यावरणविदों, आदिवासी नेताओं और प्रकृति प्रेमियों ने अरावली पर्वतमाला की सुरक्षा पर गंभीर चिंता व्यक्त की। इन्होंने आरोप लगाया कि पर्यावरण मंत्रालय के दस्तावेजों में राजस्थान के झालावाड़, बारां, कोटा, बूंदी और सवाई माधोपुर सहित कई जिलों को अरावली क्षेत्र से बाहर रखा गया है। हालांकि, वन सर्वेक्षण विभाग (एफएसआई) की वर्ष 2025 की रिपोर्ट इन जिलों को अरावली क्षेत्र का हिस्सा मानती है। अभियान की दिल्ली से आईं सह-संस्थापक नीलम अहलूवालिया ने बताया कि एफएसआई की 22 सितंबर 2025 की रिपोर्ट में पांच राज्यों के 63 जिलों को अरावली क्षेत्र में शामिल किया गया था, जबकि पर्यावरण मंत्रालय के हलफनामे में केवल 37 जिलों का उल्लेख है। पर्यावरण को गंभीर क्षति पहुंचने की आशंका अहलूवालिया ने आरोप लगाया कि यदि 100 मीटर ऊंचाई के आधार पर अरावली की नई परिभाषा लागू की जाती है, तो पर्वतमाला का 90 प्रतिशत से अधिक हिस्सा कानूनी संरक्षण से बाहर हो जाएगा। इससे बड़े पैमाने पर खनन का रास्ता खुल सकता है, जिससे पर्यावरण को गंभीर क्षति पहुंचने की आशंका है। अभियान के तहत बारां और झालावाड़ में सामाजिक कार्यकर्ताओं एवं कानूनविदों से मुलाकात कर आमजन को जागरूक किया जा रहा है। इस दौरान अभियान दल के सदस्यों का अधिवक्ताओं एवं सामाजिक क्षेत्र से जुड़े लोगों ने स्वागत किया। इस अवसर पर वरदान सिंह, एडवोकेट राजेन्द्र सिंह झाला, ओंकारेश्वर शर्मा और शशांक श्रोत्रिय सहित कई लोग मौजूद रहे।