जुलाई में विवाह और अन्य मांगलिक आयोजनों के लिए अब गिने-चुने शुभ मुहूर्त ही शेष हैं। 16 जुलाई से गुरु तारा अस्त होने के बाद अब 22 जुलाई को भड़ला नवमी का अबूझ सावा अंतिम बड़े विवाह मुहूर्त के रूप में रहेगा। इसके बाद 25 जुलाई से देवशयनी एकादशी के साथ चातुर्मास प्रारंभ हो जाएगा और विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन तथा जनेऊ जैसे मांगलिक कार्यों पर चार महीने के लिए विराम लग जाएगा। जिलेभर में भड़ला नवमी पर 200 से अधिक विवाह होने का अनुमान है। इसे देखते हुए मैरिज गार्डन, धर्मशालाएं, बैंड-बाजा, कैटरिंग, सजावट और अन्य विवाह सेवाओं से जुड़े कारोबारियों के यहां लगभग पूरी बुकिंग हो चुकी है। ज्योतिषाचार्य जितेंद्र शर्मा और सत्यनारायण खंडेलवाल के अनुसार भड़ला नवमी का अबूझ सावा ऐसा शुभ अवसर माना जाता है, जिसमें विवाह के लिए अलग से पंचांग या मुहूर्त देखने की आवश्यकता नहीं होती। यही कारण है कि इस दिन शहर से लेकर ग्रामीण क्षेत्रों तक बड़ी संख्या में विवाह समारोह आयोजित होंगे। इसके बाद देवउठनी एकादशी तक मांगलिक कार्य नहीं किए जाएंगे और विवाह सीजन सीधे नवंबर में फिर शुरू होगा। विवाह सीजन समाप्त होने से पहले बाजारों में खरीदारी चरम पर पहुंच गई है। सराफा बाजार, रेडीमेड वस्त्र, फर्नीचर, गिफ्ट आइटम, टेंट, हलवाई, फोटोग्राफी और ज्वेलरी व्यवसाय से जुड़े कारोबारियों के यहां ग्राहकों की भीड़ बनी हुई है। व्यापारियों का कहना है कि भड़ला नवमी के अबूझ सावे ने सीजन के अंतिम दौर में कारोबार को नई गति दी है। जिले के अधिकांश मैरिज गार्डन और वेडिंग वेन्यू पहले से ही बुक हो चुके हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार देवशयनी एकादशी पर भगवान विष्णु योगनिद्रा में चले जाते हैं और देवउठनी एकादशी पर जागते हैं। इन चार महीनों की अवधि को चातुर्मास कहा जाता है। इस दौरान सूर्य के दक्षिणायन होने और गुरु तारा अस्त रहने के कारण विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन और अन्य मांगलिक संस्कार नहीं किए जाते। चातुर्मास को पूजा-पाठ, व्रत, जप-तप और धार्मिक अनुष्ठानों के लिए विशेष रूप से शुभ माना जाता है। देवउठनी एकादशी के बाद ही फिर से विवाह और अन्य मांगलिक कार्यों का शुभारंभ होता है।