1971 के भारत- पाकिस्तान युद्ध में पाकिस्तानी सीमा में करीब 16 किलोमीटर घुसकर उसकी रानीहल चेकपोस्ट पर तिरंगा फहराने वाले बिग्रेडियर जगमाल सिंह राठौड़(87) का मंगलवार को अपने निवास पर निधन हो गया। वे लंबे समय से अस्वस्थ चल रहे थे। युद्ध में उनके अदम्य साहस के लिए उन्हें वीर चक्र से सम्मानित किया गया था। जगमाल सिंह ओलंपियन शूटर और वर्तमान में विधायक राज्यवर्द्धन सिंह राठौड़ के ताऊजी भी थे। उनकी बेटी कविता राठौड़ ने बताया कि वे जीवन के अंतिम दिनों में भी काफी सक्रिय थे। वे सादुलगंज में रहते थे। बुधवार को डुप्लेक्स कॉलोनी स्थित राजपूत शांति धाम में उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा। अंतिम यात्रा में शामिल होने के लिए उद्योग एवं वाणिज्य विभाग मंत्री कर्नल राज्यवर्धन सिंह राठौड़ मंगलवार (आज) रात्रि 9:30 बजे बीकानेर पहुंचेंगे। पहले देखिए- बिग्रेडियर जगमाल सिंह राठौड़ के शौर्य की यह तस्वीर 6 दिसंबर 1971 को हुई थी निर्णायक लड़ाई बेटी कविता ने बताया कि युद्ध के दौरान मेजर जगमाल सिंह राठौड़ भारतीय सेना की ग्रेनेडियर्स रेजिमेंट की 13वीं बटालियन में तैनात थे, जिसे ऐतिहासिक रूप से 'गंगा जैसलमेर' के नाम से भी जाना जाता है। वे राजस्थान सेक्टर के दुर्गम रेगिस्तानी क्षेत्र में तैनात थे, जहां सैन्य सफलता के लिए गति, रणनीति और त्वरित निर्णय बेहद महत्वपूर्ण थे। मेजर राठौड़ को दुश्मन की एक अत्यंत महत्वपूर्ण और मजबूत सुरक्षा वाली चौकी पर कब्जा करने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। 6 दिसंबर को जैसे ही उनकी कंपनी ने हमला शुरू किया, पाकिस्तानी सेना ने भारी मशीनगनों और मोर्टार से तेज गोलाबारी शुरू कर दी। हमला इतना भीषण था कि पूरी आक्रमणकारी टुकड़ी की रफ्तार धीमी पड़ने लगी। हालांकि मेजर राठौड़ ने तुरंत स्थिति का आकलन किया। इसके बाद रणनीति बदली और स्वयं एक प्लाटून का नेतृत्व किया। वे दुश्मन की फायरिंग लाइन को चकमा देते हुए किनारे से आगे बढ़े। इसके बाद दुश्मन की चौकी पर धावा बोला। इससे दुश्मन फौज को संभलने का मौका तक नहीं मिला। इसका जिक्र उनके वीरता पदक के प्रशस्ति पत्र में भी किया गया है। बेटी ने बताया कि पिता के साहसिक नेतृत्व और व्यक्तिगत वीरता के कारण भारतीय सेना ने उस महत्वपूर्ण लक्ष्य पर सफलतापूर्वक कब्जा कर लिया। इससे राजस्थान के रेगिस्तानी मोर्चे पर भारतीय सेना को महत्वपूर्ण सामरिक बढ़त मिली। पिता के कारण पाकिस्तानी सीमा में रानीहल चेक पोस्ट पर कब्जा किया जा सका और वहां तिरंगा फहरा दिया गया। देख पाकिस्तानी सेना घबरा गई और रेगिस्तानी इलाकों से पीछे हटने लगी थी। ऊंटों पर ही पाकिस्तान में घुस गए थे बेटी ने बताया कि पिता ब्रिगेडियर जगमाल सिंह 1971 के युद्ध में अपनी टीम के साथ पाकिस्तान में करीब 16 किलोमीटर तक घुस गए थे। उस समय इतने वाहन नहीं थे, तो बीकानेर की तरफ से ऊंटों पर ही वो अपनी बटालियन के साथ पाकिस्तानी सीमा में चले गए। पाकिस्तान आर्मी को अंदर तक खदेड़ दिया गया। दुश्मन के सैनिकों को बंदी भी बनाया। इस दौरान जगमाल सिंह और उनकी पूरी टीम ने बारूद गोलों के साथ हमला किया। कई बार उनकी जान पर भी बन आई थी, लेकिन वीरता का परिचय देते हुए उन्होंने पाकिस्तानी जवानों को पीछे हटने के लिए मजबूर कर दिया। तब रेडियो सिस्टम से मिलती थी जानकारी तब न तो वॉकी टॉकी थे और न मोबाइल जैसी कोई सुविधा। ऐसे में दुश्मन तक पहुंचने के बाद भी अपनी बटालियन को सूचना देने के लिए रेडियो सिस्टम का उपयोग करना पड़ता था। वे युद्ध के मैदान में पूरे जज्बे के साथ उतरते थे। इसी कारण 1971 के युद्ध में उनकी वीरता के लिए 1972 में उन्हें वीर चक्र से सम्मानित किया गया था। सिर्फ 13 दिन में हार गया था पाकिस्तान बता दें कि भारत और पाकिस्तान में 1971 का युद्ध करीब 13 दिन चला था। इसकी शुरुआत 3 दिसंबर 1971 को हुई और अंत 16 दिसंबर 1971 को हुआ था। इस युद्ध में भारत की निर्णायक जीत हुई थी। वहीं भारत के समर्थन से पूर्वी पाकिस्तान अलग होकर एक नया देश बांग्लादेश बना था। 16 दिसंबर 1971 को ढाका में पाकिस्तान की सेना ने भारतीय सेना के सामने सरेंडर कर दिया था। अब पढ़िए- युद्ध से जुड़ी जरूरी नॉलेज