कमर्शियल एलपीजी 993 रुपए महंगा होते ही शहर में खाने-पीने की चीजों के दामों में बड़ा उछाल दिखा। कचौरी-समोसा की लागत जहां करीब डेढ़ रुपए तक ही बढ़ी, वहीं दुकानदारों ने रेट 5 रुपए तक बढ़ा दिए। चाय पर लागत करीब एक रुपए बढ़ने के बावजूद कीमत 5 रुपए तक बढ़ा दी गई। ईंधन लागत में 3% की बढ़ोतरी का असर बाजार में 25 से 35% तक दिख रहा है। तेल कंपनियों ने 19 किलो के कमर्शियल एलपीजी सिलेंडर की कीमत बढ़ाकर 3071.50 रुपए कर दी है। इसके अगले ही दिन चाट, कचौरी-समोसा, मिठाई और चाय जैसे आइटम महंगे हो गए। भास्कर एक्सप्लेनर - लागत कम, बढ़ोतरी ज्यादा अगर इसे सीधे कीमत में जोड़ा जाए तो 20 रुपए तक मिलने वाले कचौरी-समोसे की कीमत अधिकतम 22 रुपए तक पहुंचनी चाहिए थी। यानी प्रति पीस डेढ़ से दो रुपए की बढ़ोतरी उचित थी। लेकिन वास्तविकता इससे अलग है। बाजार में यही कचौरी-समोसे 25 रुपए तक बेचे जा रहे हैं। यानी लागत के मुकाबले कीमत में 25% से 35% तक की बढ़ोतरी कर दी गई। यही ट्रेंड मिठाइयों में भी देखने को मिला, जहां 20 से 40 रुपए प्रति किलो तक कीमत बढ़ाई गई। स्पष्ट है कि सप्लाई चेन, मुनाफे और बाजार के व्यवहार के चलते लागत में मामूली बढ़ोतरी का असर उपभोक्ताओं पर कई गुना ज्यादा डाला जा रहा है। एक बार कीमत बढ़ने के बाद इनके वापस कम होने की संभावना भी कम रहती है, भले ही भविष्य में ईंधन या कच्चा माल सस्ता हो जाए। व्यापारियों का तर्क: गैस, तेल और कोयला महंगा उधर, व्यापारियों का कहना है कि कमर्शियल सिलेंडर कई बार ब्लैक में खरीदना पड़ता है, जिससे वास्तविक लागत और बढ़ जाती है। उनके अनुसार एक किलो एलपीजी की प्रभावी कीमत 250 रुपए तक पहुंच रही है, जिससे उत्पादन लागत पर सीधा असर पड़ता है।