प्रदेश के सरकारी कर्मचारियों के लिए शुरू की गई अर्न्ड सैलरी एडवांस ड्रावल एक्सेस स्कीम (ईएसएएस) अब सुविधा कम, दुविधा ज्यादा बन गई है। आपात जरूरत के लिए लाई गई इस योजना की आड़ में निजी फाइनेंस कंपनियां और लोन सर्विस प्रोवाइडर्स (एलएसपी) कर्मचारियों को लंबे कर्ज में धकेल रहे हैं। कर्मचारियों को 11% से 18% और कुछ मामलों में 20% तक ब्याज पर लोन दिए जा रहे हैं। एक लाख से ज्यादा कर्मचारी मोटे ब्याज के जाल में फंस चुके हैं। लोन बंद कराने का विकल्प आसानी से नहीं मिल रहा। बंद हो भी जाए तो पूरा ब्याज चुकाना पड़ रहा है। इन कर्मचारियों से सालाना करीब 1000 करोड़ रुपए से अधिक की रिकवरी हो रही है। छह से ज्यादा फाइनेंशियल इंस्टीट्यूशन और उनकी सहयोगी कंपनियां इसमें सक्रिय हैं। दूरदराज गांवों में एजेंट कमीशन लेकर कर्मचारियों को ऐप से लोन लेने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। नियम 1 माह का, खेल 60 माह का वित्त विभाग के 31 मई 2023 के सर्कुलर के अनुसार कर्मचारी अपनी कमाई गई सैलरी का अधिकतम 50% एडवांस ले सकता है। इसकी वसूली अगले महीने की तनख्वाह से अनिवार्य है। इसके बावजूद सैलरी एडवांस के नाम पर पिछले तीन साल से 6 से 60 महीने की किस्तों वाले लोन बांटे जा रहे हैं। एक्सपर्ट्स इसे सरकारी आदेशों का उल्लंघन और आरबीआई के डिजिटल लेंडिंग नियमों से बचने का ‘रेगुलेटरी शॉर्टकट’ बता रहे हैं। किस्त कटकर ही आ रही सैलरी IFMS 3.0 प्लेटफॉर्म से कंपनियां ट्रेजरी स्तर पर ही सैलरी से कटौती करवा रही हैं। चूंकि ट्रेजरी पहले निजी कंपनियों का पैसा काट लेती है, इसलिए कई कर्मचारियों के होम लोन और ऑटो लोन की बैंक किस्तें बाउंस हो रही हैं। IFMS 3.0 से कर्मचारियों का निजी वित्तीय डेटा कंपनियों से साझा हो रहा है। इसका इस्तेमाल आक्रामक मार्केटिंग और ‘लोन ट्रैप’ के लिए किया जा रहा है। गांवों में एजेंटों का कमीशन खेल शहरों के साथ ग्रामीण इलाकों में भी स्थानीय एजेंट सक्रिय हैं। ये कमीशन लेकर कर्मचारियों को लंबी अवधि और ज्यादा लिमिट का लालच दे रहे हैं। कई मामलों में लोन की राशि सैलरी अकाउंट के बजाय दूसरे खातों में भेजे जाने की भी शिकायतें हैं, जिससे वित्तीय पारदर्शिता पर सवाल उठ रहे हैं। ये हैं बड़ी खामियां - अवधि का उल्लंघन - 1 महीने की जगह 3 से 60 महीने तक कर्ज। महंगा ब्याज - ट्रांजेक्शन फीस और प्रोसेसिंग फीस के नाम पर भारी वसूली। स्टाम्प ड्यूटी से बचाव- राजस्व नियमों की अनदेखी की शिकायत। डेटा दुरुपयोग - कर्मचारियों की वित्तीय जानकारी के निजी इस्तेमाल का आरोप। भास्कर एक्सपर्ट - प्रो. एन.डी. माथुर, वरिष्ठ अर्थशास्त्री यह डेथ ट्रैप है, जो फंसा, वह फंसता ही चला गया। महीनेवार पूरी किस्तें देनी हैं और एकमुश्त भुगतान पर भी लगभग उतना ही ब्याज लगता है। दूसरी किस्तें प्रभावित होने से सिबिल खराब होता रहता है। नोडल ऑफिसर - गलत कुछ नहीं “आपातकाल के दौरान यह सुविधा बड़ी राहत देने वाली है। इसमें सैलरी को देखते हुए हाफ एडवांस का विकल्प है। लोन की व्यवस्था भी है और इसे पर्सनल लोन की कैटेगरी में रख सकते हैं। सब कुछ नियमों में कर रहे हैं।” - अशोक पाठक, योजना के नोडल ऑफिसर