सुप्रीम कोर्ट ने शनिवार को कहा कि मतदान करने और चुनाव लड़ने का अधिकार मौलिक अधिकार नहीं, बल्कि वैधानिक अधिकार हैं। जस्टिस बीवी नागरत्ना और आर महादेवन की बेंच ने कहा कि ये अधिकार केवल उतनी ही सीमा तक अस्तित्व में हैं, जितनी कानून में अनुमति दी गई है। पूर्व फैसलों का हवाला देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वोटिंग का अधिकार व्यक्ति को चुनावी प्रक्रिया में भाग लेने की अनुमति देता है, जबकि चुनाव लड़ने का अधिकार एक अलग और अतिरिक्त अधिकार है, जिसे योग्यता, पात्रता शर्तों और अयोग्यताओं के अधीन रखा जा सकता है। राजस्थान के दुग्ध संघ से जुड़ा मामला यह मामला राजस्थान के जिला दुग्ध उत्पादक सहकारी संघों के चुनाव नियमों से संबंधित है। ये संघ राजस्थान सहकारी समितियां अधिनियम, 2001 के तहत बनाए गए थ्री लेबल स्ट्रकचर में कार्य करते हैं। उम्मीदवारों की पात्रता तय करने के लिए बाय-लॉज बनाए गए हैं। उनमें शामिल थे कुछ प्राथमिक सहकारी समितियों ने इन नियमों को राजस्थान हाई कोर्ट में चुनौती दी, यह कहते हुए कि ये नियम अनुचित हैं और कानून से परे हैं। 2015 में सिंगल बेंच ने बाय-लॉज को रद्द कर दिया, लेकिन पिछले चुनावों को वैध माना। 2022 में डिवीजन बेंच ने भी इस फैसले को बरकरार रखा। इसके बाद रजिस्ट्रार ने बायलॉज में बदलाव की प्रक्रिया शुरू की। इसके बाद कुछ जिला दुग्ध संघों के अध्यक्ष ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले पर असहमति जताई सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के तर्क से असहमति जताई। उसने कहा कि बायलॉज (उपनियम) केवल पात्रता मानदंड तय करते हैं। वे न तो अयोग्यता निर्धारित करते हैं और न ही संवैधानिक सिद्धांतों का उल्लंघन करते हैं। अदालत के अनुसार, सहकारी समितियां आम तौर पर संविधान के अनुच्छेद 12 के तहत “राज्य” नहीं मानी जातीं। वे सामान्यतः सार्वजनिक कार्य नहीं करतीं। इसलिए, उनकी आंतरिक व्यवस्था विशेषकर चुनाव से जुड़े विवादों में अनुच्छेद 226 के तहत अदालत का हस्तक्षेप उचित नहीं होता। खबर अपडेट की जा रही है…