उदयपुर के आरएनटी मेडिकल कॉलेज से संबद्ध 6 अस्पतालों में मरीजों की सुरक्षा और सुविधाओं के नाम पर करोड़ों रुपए का बड़ा फर्जीवाड़ा चल रहा है। अस्पतालों में मैनपावर सप्लाई करने वाली दो एजेंसियां, पन्नाधाय सिक्योरिटी सर्विसेज और बिलीव सोल्यूशन सर्विस पिछले पांच सालों से एक ऐसा सिंडिकेट चला रही हैं, जिसमें आधे से ज्यादा कर्मचारी केवल कागजों पर काम कर रहे हैं। भास्कर इन्वेस्टिगेशन में सामने आया है कि इन दोनों कंपनियों के जरिए करीब 2 हजार कार्मिकों का टेंडर है। इसमें करीब 500 की फर्जी हाजिरी लग रही है। हर साल सरकारी खजाने से 45 करोड़ से ज्यादा का भुगतान हो रहा है। एक-एक कर्मचारी की दो-दो शिफ्ट दिखाकर भुगतान होता है। चौंकाने वाली बात है कि यश दत्त नाम का कर्मचारी पिछले तीन महीने से जेल में बंद है लेकिन अस्पताल के रिकॉर्ड में उसकी ड्यूटी चालू है। मरीजों की पर्ची में भी उसका नाम आ रहा है। इसी तरह पुष्कर की ड्यूटी एक ही समय में दो अलग-अलग जगहों पर चल रही है। रात के समय उसे नाइट ड्यूटी में सर्वर रूम में दिखाया गया है। ठीक उसी समय ट्रॉमा अस्पताल में भी उसकी ड्यूटी बताई गई है। नगर निगम के स्थाई कर्मचारी भी यहां ड्यूटी कर रहे हैं। इधर, प्रिंसीपल डॉ. राहुल जैन का कहना है कि भुगतान की जिम्मेदारी अस्पताल अधीक्षकों की है। हम मामले की जांच करा रहे हैं। (दैनिक भास्कर के पास सभी रिकॉर्ड मौजूद हैं।) कर्मचारियों की दो शिफ्ट दिखा दोहरा भुगतान किया जा रहा केस-1 : यशदत्त तीन महीने से जेल में बंद है, लेकिन अस्पताल के आउटडोर में ड्यूटी
यश दत्त पिछले तीन महीने से जेल में है। पुलिस ने उसे एमडी ड्रग्स के साथ पकड़ा था। अस्पताल के रिकॉर्ड में उसकी ड्यूटी हर रोज आउटडोर में चालू है। उसकी हाजिरी भरी जा रही है। केस-2 : मां योजना में दो-दो शिफ्टों में ड्यूटी
बर्न वार्ड (मां योजना) में मुकेश माली, हंसा बाई, लवीना मेवाड़ी और निशंल मेघवाल की सुबह और शाम, दोनों शिफ्टों में लगातार ड्यूटी दिखाई जा रही है। भुगतान उठाया जा रहा है। केस-3 : दिन, शाम और रात, 24 घंटे सब जगह ड्यूटी लगी
मुकुल गहलोत नाम के कर्मचारी की 24 घंटे की नौकरी चल रही है। रात में ट्रॉमा में मां योजना का ऑपरेटर है। शाम को मां योजना के बर्न वार्ड में है। सुबह ट्रॉमा अस्पताल में है। तीनों का भुगतान उठाया जा रहा है। अस्पतालों में एजेंसियां ऐसे चला रही हैं कमीशन और वसूली का पूरा खेल
राज्य सरकार की ओर से एजेंसी के कर्मचारियों का वेतन उनके बैंक खातों में ट्रांसफर होता है। वेतन जमा होते ही कंपनी के कर्मचारी व सुपरवाइजर इनसे संपर्क करते हैं। नकद या ऑनलाइन ट्रांसफर के जरिए वे पूरा पैसा अपने खातों में डलवा लेते हैं। भास्कर के पास इसका रिकॉर्ड है। यह खेल करीब 5 साल से चल रहा है। लेकिन किसी को इस फर्जीवाड़े की भनक नहीं लगी। कर्मचारियों के खातों में दो-दो सैलेरी डालकर आधी वापस ले रही ठेका कंपनियां केस-01 | कंप्यूटर ऑपरेटर योगेश गिरी की डबल सैलरी हर महीने आ रही है। एक शिफ्ट की सैलरी बाद में गोपाल सिंह (कंपनी सुपरवाइजर) के खाते में वापस डाली जा रही है। केस-02 | इसी तरह कंप्यूटर ऑपरेटर विकास कुमावत की सैलरी 8 हजार दो बार खाते में आई। उसी दिन उसने 8100 रुपए विश्वजीत के खाते में डाल दिए। केस-03 | कंप्यूटर ऑपरेटर निर्भय सिंह को भी डबल सैलरी 16 हजार 281 रुपए मिले। उसी दिन उसने एक शिफ्ट की सैलरी 7800 रुपए मुकेश माली के खाते में डाल दी।