आरएनटी मेडिकल कॉलेज और इससे जुड़े अस्पताल इन दिनों जांचों के भारी दबाव तले दबे हैं। एमबी और सुपर स्पेशियलिटी ब्लॉक (एसएसबी) में आने वाले मरीजों के लिए सबसे बड़ी चुनौती बीमारी का पता लगाना बन गई है। अस्पताल में जांच सुविधाओं और मरीजों की संख्या के बीच का संतुलन पूरी तरह बिगड़ चुका है। विशेषकर एमआरआई और सीटी स्कैन जैसी बड़ी जांचों के लिए मरीजों को हफ्तों-महीनों का इंतजार करना पड़ रहा है। मरीजों की कतारों के बीच दैनिक भास्कर ने पड़ताल की। सामने आया कि संभाग के इस सबसे बड़े केंद्र पर केवल एक एमआरआई मशीन उपलब्ध है। ओपीडी में दिखाने वाले मरीजों को फिलहाल 45 से 50 दिन बाद की तारीख दी जा रही है। यानी अभी अप्रैल के अंत में दिखाई गई जांच के लिए मरीज का नंबर जून के दूसरे सप्ताह में आएगा। एक एमआरआई जांच में करीब 25 से 30 मिनट का समय लगता है। मशीन 24 घंटे चलने के बावजूद रोज 30 से 35 जांचें ही कर पाती है। विभाग की मजबूरी ये भी उसे पहले आईसीयू, वार्ड में भर्ती मरीजों और इमरजेंसी केस (जैसे ब्रेन स्ट्रोक या एक्सीडेंट) को प्राथमिकता देनी पड़ती है। ऐसे में दूर-दराज से आए सामान्य मरीज केवल तारीख लेकर घर लौट रहे हैं। सीटी स्कैन : मिल रही तारीखें दो सीटी स्कैन मशीनें चालू हैं। सामान्य स्कैन हो रहे हैं, लेकिन कंट्रास्ट स्कैन (जिसमें विशेष दवा के जरिए नसों की स्पष्ट तस्वीर ली जाती है) के लिए ओपीडी मरीजों को 5 दिन तक रुकना पड़ रहा है। भर्ती मरीजों को भी अगले दिन का समय दिया जा रहा है। दो नई मशीनें लगाने की तैयारी है, जिनके शुरू होने पर ही यह दबाव कम होगा। मरीजों की आपबीती बुधवार को अस्पताल के कमरा नंबर 37 और रेडियोलॉजी विभाग के बाहर कतारों में खड़े मरीजों की तकलीफ सामने आई। कोड़ियात निवासी रूपा भाई ने बताया कि वह पिछले 7 दिनों से अस्पताल में भर्ती हैं। फेफड़ों की समस्या है, लेकिन एक्स-रे के लिए सातवें दिन नंबर आ पाया। गोगंुदा की रहने वाली सरसी बाई सुबह 8 बजे गांव से निकली थीं, ताकि डॉक्टर को दिखा सकें। डॉक्टर ने एक्स-रे लिखा, लेकिन दोपहर तक कतार में बारी का इंतजार करती रहीं। शहर के बेड़वास निवासी रुक्मिणी बाई और बंबोरा की मावी बाई (बम्बोरा) सोनोग्राफी के लिए पहुंची थीं। सोनोग्राफी के 10 कमरे होने के बावजूद मरीजों की संख्या इतनी अधिक थी कि दोपहर तक इन महिलाओं को अपनी बारी आने का इंतजार करना पड़ा। स्टाफ का भी संकट: 65% पद खाली, इसलिए परेशानी जांच में देरी का एक बड़ा कारण विशेषज्ञों की कमी है। रेडियोलॉजी विभाग के स्वीकृत ढांचे और वर्तमान स्थिति में बड़ा अंतर है। डॉक्टरों के 17 पद स्वीकृत हैं, लेकिन इसके मुकाबले 4 ही नियमित कार्ररत हैं। अर्जेंट टेंपरेरी बेसिस (अस्थायी) पर 2 डॉक्टर नियुक्त हैं। 11 पद खाली होने से मशीनों को पूरी क्षमता से चलाने और समय पर रिपोर्ट बनाने में दिक्कत आ रही है। सीनियर डॉक्टर नहीं होने से पूरा भार मौजूद 6 डॉक्टरों और 16 रेजिडेंट्स पर है। दूसरी जांचों की स्थिति एचओडी ने फोन तक नहीं उठाया मरीजों की परेशानी को लेकर भास्कर ने कॉलेज के रेडियोलॉजी विभाग अध्यक्ष डॉ. एनके कदम से बातचीत का प्रयास किया। तीन बार प्रयास के बावजूद उन्होंने कॉल रिसीव नहीं किया।