भास्कर न्यूज | जैसलमेर ओरण बचाओ समिति की पदयात्रा अजमेर के किशनगढ़ को पार कर चुकी है। ओरण यात्री अब जयपुर से सिर्फ 110 किलोमीटर दूर है। ओरण यात्रियों के जयपुर पहुंचने से पहले ही सरकार द्वारा जमीनों को ओरण में दर्ज करवाने का प्रयास तो किया जा रहा है। लेकिन वास्तविकता में ओरण के रूप में दर्ज की जा रही जमीन बहुत कम है। ओरण यात्रियों द्वारा आरोप लगाया जा रहा है सरकार ने हाल ही में आदेश जारी कर मोकला के पास डूंगरपीर की ओरण में 8 हजार 363.4 बीघा जमीन को ओरण में दर्ज किया गया है। लेकिन 8 जून 2023 को पंचायत की एनओसी के बाद 19 जून को ओरण क्षेत्र घोषित करने का प्रस्ताव लिया गया था। 3 जुलाई 2023 को उपखंड कार्यालय से यह प्रस्ताव कलेक्टर कार्यालय पहुंचा। 11 जुलाई 2023 को कलेक्टर कार्यालय से कुछ आपत्तियां लगाकर वापस उपखंड अधिकारी जैसलमेर को प्रस्ताव भेजा गया। 13 जुलाई को आपत्तियों का जवाब देते हुए फिर से कलेक्टर कार्यालय को प्रस्ताव भिजवाए गए। मौके पर आज भी 40 हजार बीघा जमीन सुरक्षित है। लेकिन गांव दस्तूर में 25 हजार अंकित है। ऐसे में पहली बार जब फाइल चली तो उसमें 22 हजार 105 बीघा जमीन ओरण में दर्ज करने के प्रस्ताव बनाए गए। इसके बाद कुछ माह पूर्व जैसलमेर में ओरण प्रेमियों द्वारा दिए गए धरने के बाद इस फाइल से धूल हटाई गई और फिर से पंचायत से एनओसी ली जाकर प्रस्तावित जमीन 19 हजार बीघा कर दी गई। जिसके बाद वापिस जयपुर भेजी गई फाइल में 14 हजार बीघा आरक्षित करने की अनुशंषा की गई। जिस पर सरकार ने आदेश जारी कर 1393.90 हेक्टेयर यानि करीब 8 हजार 363.4 बीघा जमीन ही आरक्षित की गई है। ओरण को सरकारी रिकॉर्ड में ओरण के रुप में दर्ज करवाने के लिए पिछले दिनों जैसलमेर के पर्यावरण प्रेमियों द्वारा तनोट से जयपुर तक ओरण यात्रा निकाली जा रही है। सरकार ने देगराय ओरण में भीमसर गांव की 5 हजार 882.15 बीघा, बिंजोता ओरण में 597.16 बीघा, स्वांगिया माता ओरण में पूनमनगर में 3 हजार 607.13 बीघा, आलाजी ओरण में दिलावर का गांव व कुछड़ी में 7 हजार 473.03 बीघा के बाद अब मोकला के पास डूंगरपीर जी ओरण के लिए 8 हजार 363.4 बीघा भूमि आरक्षित करने के आदेश जारी किए है। ^हमारे जनप्रतिनिधि सरकार के सामने हमारी बात को सही ढंग से रख ही नहीं पा रहे हैं। हमारा एक ही उद्देश्य है कि जिले की 22 लाख बीघा जमीन को ओरण के रूप में दर्ज किया जाए। हम ओरण के लिए जितनी जमीन आरक्षित करने की मांग कर रहे है, वह कुल जमीन का सिर्फ 10 प्रतिशत हिस्सा ही है। हम अभी किशनगढ़ से निकले है, अभी जयपुर 110 किलोमीटर है। हम अपनी मांग पर अडिग है, हमारी ओरण यात्रा नहीं रूकेगी। हम अपनी यात्रा जारी रखे हुए है। -भोपालसिंह जालोड़ा, ओरण यात्री आंदोलनकारियों का जत्था जैसे-जैसे जयपुर की ओर बढ़ रहा है, सरकार व प्रशासन पर दबाव बढ़ता जा रहा है। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि जब तक सरकार पूरी 25 लाख बीघा जमीन को ओरण घोषित करने का ठोस रोडमैप पेश नहीं करती, तब तक वे राजधानी में महापड़ाव डालने को तैयार हैं। इसके साथ ही जनप्रतिनिधियों द्वार 8 हजार बीघा जमीन को ओरण में दर्ज करवाने की बधाइयां ली जा रही है। ग्रामीणों के अनुसार डूंगरपीरजी नाम से प्राचीन ओरण है जोकि जैसलमेर रियासत की स्थापना के थोड़े समय बाद तकरीबन 800 सालों से स्थित है। वीर डूंगरपीरजी जैसलमेर दुर्ग के संस्थापक महारावल जैसलदेव के पुत्र शालीवाहनसिंह के पुत्र राजकुमार मोकलजी के पुत्र थे। जो मोकला गांव के नजदीक चेतोवेला मगरे के पास काठोड़ी गांव के ब्राह्मणों और गायों की रक्षा करते हुए अपने भतीजे वीर चाहड़जी के साथ वीरगति को प्राप्त हुए थे। इसी स्थान पर दोनों वीरों का मुख्य मंदिर और उनके नाम से रियासतकालीन प्राचीन ओरण स्थित है। इसे डूंगरपीरजी के भ्राता भादोजी ने 13 कोस की परिधि में 40 हजार बीघा जमीन पर दूध की धार देकर ओरण छोड़ी जो कि रावजी की बही में अंकित है।