मातृत्व और शिशु स्वास्थ्य को एक नई दिशा देने के उद्देश्य से राजकीय बीडीके अस्पताल में 'विश्व स्तनपान सप्ताह शुभारंभ किया गया। कार्यक्रम के दौरान पीएमओ एवं वरिष्ठ शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. जितेंद्र भाम्बू के नेतृत्व में स्वास्थ्यकर्मियों कि ओर से शत-प्रतिशत (100%) नवजात शिशुओं को केवल मां का दूध पिलाने के लिए माताओं को प्रेरित करने की शपथ ली। इस दौरान डॉक्टरों ने प्रसूताओं के वार्डों में जाकर उनसे सीधा संवाद किया और अस्पताल में मिल रही मेडिकल सुविधाओं का फीडबैक भी लिया। ​सीएलएमसी यूनिट प्रसूताओं का सबसे बड़ा सहारा ​समारोह की अध्यक्षता करते हुए सीएलएमसी (Comprehensive Lactation Management Centre) यूनिट प्रभारी डॉ. सिद्धार्थ शर्मा ने बताया कि यह यूनिट अस्पताल में आने वाली प्रसूताओं के लिए वरदान साबित हो रही है। स्तनपान से जुड़ी हर छोटी-बड़ी समस्या का समाधान यहां अनुभवी डॉक्टरों द्वारा किया जा रहा है। कार्यक्रम का संचालन शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. नेमीचंद कुमावत ने किया, जिन्होंने इस यूनिट के जरिए महिलाओं को मिलने वाली सहायता की जानकारी दी। ​पीएमओ एवं वरिष्ठ शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. जितेंद्र भाम्बू ने कहा कि स्तनपान किसी भी नवजात शिशु के जीवन की पहली और सबसे मजबूत नींव है। यह बच्चे को कई तरह की गंभीर बीमारियों से बचाता है। नवजात के लिए जरूरी है स्तनपान समाज में एक आम गलतफहमी है कि जन्म के पहले तीन दिनों तक मां का दूध नहीं आता है। डॉ. भाम्बू ने इसे पूरी तरह खारिज करते हुए बताया कि प्रसव के तुरंत बाद आने वाला गाढ़ा पीला दूध (कोलोस्ट्रम) अमृत के समान होता है, जो नवजात की रोग प्रतिरोधक क्षमता (इम्युनिटी) को कई गुना बढ़ा देता है। उन्होंने बताया कि जन्म के समय शरीर में 'प्रोलैक्टिन' हार्मोन का स्राव अत्यधिक मात्रा में होता है, जो स्तनपान शुरू करवाने में सबसे अहम भूमिका निभाता है। इसलिए बिना किसी देरी के जन्म के तुरंत बाद स्तनपान शुरू किया जाना चाहिए। ​आधुनिक जीवनशैली की चुनौतियां डॉ. भाम्बू ने चिंता जताई कि आज की बदलती जीवनशैली, बढ़ती उम्र में विवाह, एकाकी परिवारों (न्यूक्लियर फैमिली) का चलन और उचित मातृत्व प्रशिक्षण की कमी के कारण कई बार नई माताओं को स्तनपान स्थापित करने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है, जिन्हें बीडीके अस्पताल की टीम काउंसलिंग के जरिए दूर कर रही है। ​गर्भावस्था के दौरान ही शुरू हो जाती है स्तनपान की तैयारी ​प्रसूति रोग विभागाध्यक्ष एवं सह आचार्य डॉ. प्रियंका शेखसरिया ने बताया कि महिलाओं को प्रसव के बाद नहीं, बल्कि गर्भावस्था के दौरान एएनसी (ANC) चेक-अप के समय से ही स्तनपान के प्रति जागरूक करना शुरू कर दिया जाता है। ​उन्होंने एक बेहद संवेदनशील और परोपकारी अपील करते हुए कहा कि जिन माताओं के पास अतिरिक्त दूध है, उन्हें 'दुग्धदान' (मदर मिल्क डोनेशन) के लिए आगे आना चाहिए। आपका यह दान अस्पताल के एसएनसीयू में भर्ती गंभीर रूप से बीमार या अस्वस्थ नवजातों की जिंदगी बचाने में बहुत बड़ा योगदान दे सकता है। ​प्रकृति ने हर मां को बनाया है सक्षम: डॉ. विजय झाझडिया ​एसएनसीयू (SNCU) प्रभारी डॉ. विजय झाझडिया ने अपने संबोधन में कहा कि प्रकृति ने हर मां को अपने बच्चे के लालन-पालन और स्तनपान करवाने के लिए पूरी तरह सक्षम बनाया है। ​बच्चे के जन्म से लेकर शुरुआती 6 महीने तक उसे सिर्फ और सिर्फ मां का दूध ही पिलाना चाहिए। ​इस दौरान पानी, शहद, घुट्टी या अन्य किसी भी बाहरी चीज को पूरी तरह से हतोत्साहित किया जाना चाहिए, क्योंकि इससे नवजात के पाचन तंत्र पर बुरा असर पड़ सकता है। ये रहे मौजूद इस अवसर पर डॉ. सिद्धार्थ शर्मा, डॉ. विजय झाझडिया, डॉ. प्रियंका शेखसरिया, डॉ. नेमीचंद कुमावत, डॉ. विजेन्द्र ज्याणी, डॉ. नावेद अख्तर, डॉ. आकांक्षा गौड़, नर्सिंग अधीक्षक मुकेश मीणा, प्रियंका खटकड़, सरिता नूनिया, सुनीता मीणा और संतोष सहित अस्पताल के तमाम चिकित्साकर्मी और नर्सिंग स्टाफ मौजूद रहे।