फिजिकल एजुकेशन में मास्टर्स करने के बाद प्राइवेट स्कूल में शिक्षक के रूप में काम शुरू किया, लेकिन सपना सरकारी नौकरी का था। दो बार असफलता मिली, तो हार मानने के बजाय नया रास्ता चुना। कोरोना काल में पड़ोसी गांव में बेर की खेती देखकर आइडिया आया। पारंपरिक खेती के साथ 6 बीघा जमीन पर बेर की तीन अलग-अलग किस्मों के पौधे लगाए। आज वही बगीचा मेहनत की पहचान बन चुका है। इस सीजन में करीब 3 लाख रुपए की आमदनी हो चुकी है। ऑन कॉल बुकिंग कर लोग खुद बगीचे तक खरीदने पहुंच जाते हैं। म्हारे देस की खेती में इस बार बात झुंझुनूं के किसान योगेंद्र पायल की… प्रगतिशील किसान योगेंद्र पायल (48), चिड़ावा पंचायत समिति के लोदीपुरा गांव के रहने वाले हैं। उनके पास 70 बीघा जमीन है, जो दो भाइयों में बंटी हुई है। बड़े भाई सुशील पायल भी खेती का कार्य करते हैं। योगेंद्र पायल ने 1999 में अजमेर BDS यूनिवर्सिटी से फिजिकल एजुकेशन में मास्टर्स किया था। पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने सरकारी नौकरी के लिए तैयारी शुरू की। साथ ही एक प्राइवेट स्कूल में फिजिकल एजुकेशन शिक्षक के रूप में काम भी किया। लगातार दो प्रयासों के बाद भी सरकारी नौकरी में सफलता नहीं मिली। इसके बाद वर्ष 2015 के बाद उन्होंने प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी छोड़कर पूरी तरह खेती को अपनाने का निर्णय लिया, लेकिन पांच साल तक परंपरागत खेती ही की। कोरोना काल में नई खेती की ओर बढ़ा रुझान कोरोना काल के दौरान उन्होंने पड़ोसी गांव में एक किसान के खेत में बेर की खेती देखी। वहां से उन्हें इस फसल की वैरायटी और खेती के तरीकों की जानकारी मिली। इसके बाद यूट्यूब से बेर की खेती के बारे में अन्य जानकारी जुटाई। 2021 में 260 पौधों से की शुरुआत योगेंद्र पायल ने बताया कि साल 2021 में उन्होंने कोलकाता से बेर की कश्मीर रेड एपल, बाल सिंदूरी और थाई एपल किस्म के कुल 260 पौधे मंगवाए। इन पौधों को खेत में निर्धारित दूरी के अनुसार लगाया गया। पौधों को गर्मियों के सीजन में महीने में दो बार पानी की जरूरत होती है। शुरुआत में पौधों की नियमित देखभाल की गई और सही प्रबंधन के चलते पौधों ने अच्छी ग्रोथ दिखाई। महज दो साल के भीतर ही पौधों से उत्पादन शुरू हो गया। पौधे से 60 किलो तक बेर का उत्पादन योगेंद्र पायल ने बताया कि बेर के पौधे की सामान्यतः उम्र लगभग 30 साल होती है। इसमें सितंबर-अक्टूबर के आसपास फूल आने लगते हैं। इसके बाद जनवरी के महीने से फल पककर तैयार होने लगते हैं। बगीचे के हर पेड़ से औसतन 60 किलो तक बेर का उत्पादन मिल रहा है। इस बगीचे में सिंचाई और देखरेख की लागत भी अपेक्षाकृत कम रहती है। जैविक खाद और प्राकृतिक खेती का मॉडल योगेंद्र पायल ने बताया कि बगीचे में किसी भी प्रकार की रासायनिक उर्वरक का उपयोग नहीं करते। खेत में गोबर, नीम की पत्ती, आक, धतूरा, खल समेत अन्य जैविक सामग्री मिलाकर लिक्विड खाद तैयार करते हैं। अच्छी पैदावार के लिए खाद साल में दो बार देने की आवश्यकता होती है। फल लगने के समय पेड़ों पर नीम के तेल का छिड़काव किया जाता है, जिससे कीटों से बचाव हो सके। योगेंद्र पायल ने बताया कि बेर की तुड़ाई का सीजन खत्म होने के बाद पौधों की कटिंग की जाती है, ताकि नई शाखाएं विकसित हो सकें और उत्पादन बेहतर बना रहे। फोन पर ऑर्डर, खेत में पहुंच रहे ग्राहक ऑर्गेनिक तरीके से तैयार बेर की स्थानीय बाजार में अच्छी मांग है। जहां मंडी में बेर लगभग 40 रुपए प्रति किलो के भाव से बिकते हैं, वहीं किसान अपने ग्राहकों को ऑर्डर पर सीधे घर पहुंचाकर 70 रुपए प्रति किलो के हिसाब से बिक्री करते हैं। इसके अलावा अधिकतर लोग खुद खेत पर पहुंचकर बेर ले जाते हैं। स्थानीय स्तर पर बेहतर मांग के कारण उन्हें मंडी जाने की आवश्यकता भी नहीं पड़ती और सीधे ग्राहकों से बिक्री हो जाती है। --- खेती-किसानी से जुड़ी यह खबर भी पढ़िए... 8 बीघा में फूलों की खेती, 10 लाख सालाना कमाई:कर्ज से जमीन बेचने की नौबत आ गई थी, एक सलाह ने बदली किस्मत पिता को कैंसर होने के बाद पांच साल तक इलाज में लाखों रुपए का कर्ज हो गया। मंडी की नौकरी से मिलने वाली सैलरी बहुत कम थी। जमीन बेचने की नौबत आ गई थी। पूरी खबर पढ़िए