प्रतापगढ़ जिले में बाल विवाह रोकने के लिए प्रशासन ने इस बार अक्षय तृतीया से पहले कड़ा अभियान चलाया है। चाइल्ड हेल्पलाइन 1098 और गायत्री सेवा संस्थान को अब तक कुल 20 सूचनाएं प्राप्त हुईं, जिन पर कार्रवाई करते हुए 10 बाल विवाह समय रहते रुकवा दिए गए। बाकी मामलों में जांच और कानूनी प्रक्रिया जारी है। प्रशासन की इस मुहिम को जिले में बाल अधिकार संरक्षण की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है। अधिकारियों का कहना है कि इस तरह की कार्रवाई आगे भी लगातार जारी रहेगी ताकि नाबालिग बच्चों का भविष्य सुरक्षित रखा जा सके। दो मामलों में कोर्ट से आदेश लेकर बाल विवाह रोका अभियान की सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही कि दो मामलों में कोर्ट से ऑर्डर जारी कर बाल विवाह को कानूनी रूप से रोका गया। प्रशासनिक अधिकारियों के अनुसार, जिले में यह पहली बार हुआ है जब बाल विवाह रोकने के लिए इतनी प्रभावी कानूनी कार्रवाई की गई। इसे भविष्य में ऐसे मामलों के लिए मजबूत उदाहरण माना जा रहा है, जिससे समाज में भी स्पष्ट संदेश जाए कि बाल विवाह कानूनन अपराध है। धरियावद क्षेत्र में संयुक्त टीम ने की त्वरित कार्रवाई धरियावद तहसील के पारसोला थाना क्षेत्र में तीन नाबालिग बच्चों के विवाह की सूचना प्रशासन को मिली थी। इसके बाद 27 अप्रैल 2026 को संयुक्त टीम मौके पर पहुंची। इस टीम में जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रन एलायंस, गायत्री सेवा संस्थान, चाइल्ड हेल्पलाइन 1098, जिला विधिक सेवा प्राधिकरण और पुलिस विभाग के सदस्य शामिल थे। जांच के दौरान तीनों बच्चों की उम्र नाबालिग पाई गई। पहले समझाइश, फिर कानूनी कार्रवाई शुरुआत में परिजनों को नोटिस देकर विवाह नहीं करने की चेतावनी दी गई थी। हालांकि बाद में सूचना मिली कि शादी की तैयारियां फिर से जारी हैं। इसके बाद प्रशासन ने मामले को गंभीरता से लेते हुए न्यायालय का रुख किया। जिला विधिक सेवा प्राधिकरण और बाल अधिकारिता विभाग की मदद से अदालत में आवेदन पेश किया गया। धरियावद कोर्ट ने उसी दिन लगाई रोक धरियावद न्यायालय ने 27 अप्रैल 2026 को ही प्रस्तावित बाल विवाह पर निषेधाज्ञा आदेश जारी कर दिया। अदालत के आदेश के बाद विवाह पर तत्काल प्रभाव से कानूनी रोक लग गई। इस कार्रवाई को जिले में बाल विवाह रोकथाम अभियान की बड़ी सफलता माना जा रहा है। सामाजिक कार्यकर्ताओं की अहम भूमिका पूरे अभियान में जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के सचिव केदारनाथ, सहायक निदेशक उमेद अली, सामाजिक कार्यकर्ता रामचन्द्र मेघवाल, अंतिम बाला टॉक टीम, चाइल्ड हेल्पलाइन और पुलिस विभाग की महत्वपूर्ण भूमिका रही। बाद में परिजनों को न्यायालय में पेश किया गया, जहां उन्हें सख्ती से बाल विवाह नहीं कराने के निर्देश दिए गए और शपथ पत्र भी भरवाए गए। बाल अधिकार विशेषज्ञ और राजस्थान बाल आयोग के पूर्व सदस्य डॉ. शैलेंद्र पंड्या ने बताया कि बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम, 2006 की धारा 13(1) के तहत जारी निषेधाज्ञा आदेश बेहद महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि इस तरह के कानूनी कदम न सिर्फ बाल विवाह रोकने में मददगार हैं, बल्कि समाज में जागरूकता बढ़ाने का भी काम करते हैं।