राजस्थान के 20 हजार से ज्यादा सरकारी स्कूलों की बिल्डिंग की मरम्मत के लिए जारी 503 करोड़ के बजट में हुए करोड़ों के फर्जीवाड़े का खुलासा आपने पार्ट-1 में पढ़ा (लिंक सबसे आखिरी में)। आज पार्ट-2 में पढ़िए- जिम्मेदारों की कौनसी लापरवाहियों के चलते ये हुआ। भास्कर की पड़ताल में सामने आया कि अफसरों ने ज्यादातर स्कूलों का फिजिकल सर्वे ही नहीं किया। बगैर किसी आकलन के सभी स्कूलों में लगभग एक जैसे काम कराने के जनरल शेड्यूल (निर्माण लागात की रेट सूची) बनाए गए। कई स्कूलों के मुखिया को जी-शेड्यूल की कॉपी नहीं दी गई, जिसके चलते ठेकेदारों ने मनमाने तरीके से काम किए। अधिकारियों ने बिना उस काम को मौके पर चेक किए ही NOC जारी कर दी। पढ़िए पूरी रिपोर्ट… ठेकेदारों को पर्चियों पर लिखकर बताए अलग काम दौसा जिले के अतिरिक्त जिला समन्वयक समग्र शिक्षा (ADPC) कार्यालय ने 4 दिसंबर 2025 को 1010 स्कूलों में एक ही टेंडर में प्रति स्कूल 1 लाख 96 हजार रुपए के हिसाब से कुल 19 करोड़ 79 लाख 60 हजार रुपए के स्कूल वाइज टेंडर निकाले थे। कई ठेकेदारों को बल्क में ये काम मिले थे। पड़ताल में सामने आया कि स्कूलों में क्या काम होगा, इसे सार्वजनिक ही नहीं किया गया। समसा के इंजीनियर (JEN) विजय सिंह से जी-शेड्यूल की जानकारी मांगी तो उन्होंने एक पीडीएफ भेजी। उस पीडीएफ में 26 तरह के काम दर्शाए गए। चौंकाने वाली बात ये है कि जर्जर हो चुके ज्यादातर स्कूलों में ऐसे कार्यों की जरूरत तक नहीं थी। बिना स्कूल की जरूरत या उसका सर्वे किए जी-शेड्यूल तय किए गए। पड़ताल में सामने आया कि दौसा जिले में ठेकेदारों को पर्चियों पर काम लिखकर दिए गए। भास्कर के पास इस बदले गए जी शेड्यूल की हेंड रिटन पर्ची हैं, जो ठेकेदारों को भेजी गई थी। एजुकेशन का काम देखने वाले अफसरों को बिल्डिंग सुधारने का जिम्मा डीडवाना-कुचामन जिले में बिल्डिंगों की मरम्मत का जिम्मा ऐसे विभाग और अफसरों को दिया गया, जिनका इनसे संबंध नहीं है। शिक्षा विभाग में बिल्डिंग निर्माण के लिए अलग से विभाग बना हुआ है- समग्र शिक्षा अभियान (समसा)। प्रदेश के कई जिलों में काम इसी एजेंसी को सौंपा गया। कुछ जिलों में पंचायत समितियों को भी नोडल एजेंसी बनाया गया। डीडवाना-कुचामन में दो ब्लॉक कुचामन और मौलासर के लिए टेंडर सीबीईओ स्तर से निकाले गए थे। सीबीईओ का काम शिक्षा और स्कूल संचालनों को देखना होता है। मौलासर सीबीईओ ने 154 स्कूलों में तो कुचामन सीबीईओ ने 229 स्कूलों के लिए प्रत्येक स्कूल में एक लाख 96 हजार रुपए के रिपेयर खर्च के हिसाब से टेंडर किए थे। कलेक्टर ने बनाया था एजेंसी कुचामन सीबीईओ बीएल खोखर ने बताया कि हमें तो तत्कालीन जिला कलेक्टर डॉक्टर महेंद्र खगड़ावत ने ही कार्यकारी एजेंसी बनाया था, इसके आदेश जारी हुए थे। हमने ये टेंडर किए और काम करवाए। 229 स्कूलों में से हमने 225 स्कूलों में काम पूरे करवाए हैं, तीन बिल्डिंग ज्यादा डैमेज थी और एक नई थी तो उनमे काम नहीं करवाया गया। मौलासर सीबीईओ रामचंद्र ने बताया कि 154 में से हमने 225 स्कूलों में काम पूरे करवाए हैं। जिला कलेक्टर को इसके लिए मना भी किया था। अब उन्होंने हमें क्यों कार्यकारी एजेंसी बनाया, ये तो वहीं बता सकते हैं। टेंडर 116 स्कूल का, काम हुआ 39 स्कूलों में अजमेर जिले में समसा एडीपीसी के अतिरिक्त इन सभी ब्लॉक में संबंधित पंचायत समिति कार्यालयों को भी कार्यकारी एजेंसी बनाया गया था। उन्होंने भी पंचायत समिति वार टेंडर किए। लेकिन कई पंचायत समितियों में आधे स्कूलों में काम नहीं हुआ। सरकारी आंकड़ों में दावा है.... सिंगल फर्मों को भी ठेके जारी अजमेर की पीसांगन पंचायत समिति में कई काम ऐसे मिले, जहां टेंडर में सिर्फ एक ही फर्म ने भाग लिया और उसे मामूली रेट पर ठेके दे दिए गए। गोविंदगढ़ और पिचौलिया पंचायतों में करीब 29.14 लाख रुपए के काम एक ही फर्म, मैसर्स एमडीआर कंस्ट्रक्शंस एंड सप्लायर्स को दिए गए। संचालक का कहना है कि कई स्कूलों ने काम कराने से मना कर दिया, इसलिए सभी काम पूरे नहीं हो सके। काम का पेमेंट हो गया है। पीसांगन पंचायत समिति ने मैसर्स भड़ाना कंस्ट्रक्शन को 74.81 लाख रुपए और मैसर्स टीकमचंद कुमावत कॉन्ट्रेक्टर को 28.69 लाख रुपए के कार्य जारी किए। टीकमचंद कुमावत ने बताया कि उन्हें केवल मोजेक टाइल्स लगाने का निर्देश दिया गया था, लेकिन कई स्कूलों ने काम नहीं कराया। काम का पेमेंट हो गया। 4 लेवल पर बरती एक से एक बड़ी लापरवाही? 1. जल्दबाजी में सभी स्कूलों के एक जैसे जी-शेड्यूल : जिला कलेक्टर ने समसा और पंचायत समितियों को कार्यकारी एजेंसियां बनाया था। ऐसे में इन डिपार्टमेंट के टेक्निकल ऑफिसर्स को सभी स्कूलों का सर्वे कर जी- शेड्यूल एस्टीमेट बनाने थे। यानी स्कूल की बिल्डिंग मजबूत करने के लिए कहां-कहां मरम्मत की जरूरत है। इसके बाद ही टेंडर जारी करने थे। बिना स्कूल की जरूरत जाने और भौतिक सत्यापन किए बगैर ही एक जैसे जी-शेड्यूल बना दिए गए। 2. जल्दबाजी में टेंडर : समसा और पंचायत समितियों को वर्क ऑर्डर जारी करने थे। जल्दबाजी में टेंडर जारी किए। इसके चलते कई जगहों पर सिंगल फर्मों की बिड मिली और उन्हें टेंडर जारी कर दिए गए। 3. मॉनिटरिंग में कमी : फर्म को स्कूल में जी-शेड्यूल अनुसार अपना काम पूरा करना था। स्कूल हेड और स्थानीय सरपंच से उसे वेरिफाई करवाना था। कई स्कूलों में इन लोगों को जी शेड्यूल ही नहीं दिखाए गए। इससे मॉनिटरिंग नहीं हुई। जहां स्कूल हेड ने सवाल जवाब किए उन्हें मौखिक ही काम बता दिए गए। 4. इंस्पेक्शन की कमी : कॉन्ट्रेक्टर फर्मों को लोकल लेवल के तीन अलग-अलग डिपार्टमेंट के टेक्निकल अधिकारियों (एईएन) से काम को वेरिफाई करवाकर बिल पर साइन करवाने थे। इसके बाद संबंधित एसडीएम की तरफ से भी बिल वेरिफाई होना था। अगर ये अधिकारी मौके पर जाते तो अधूरे काम पर कहीं तो आपत्ति दर्ज होती। फर्मों को नोटिस जारी होते। लेकिन जाहिर है अधिकतर जगहों पर ये काम कागजों में ही पूरा कर दिया गया, यही वजह है कि 31 मार्च 2026 से पहले-पहले बिल पास हो गए। जिम्मेदार अफसरों से सवाल-जवाब सवाल : जल्दबाजी में जी-शेड्यूल बनाए गए, कई स्कूलों में जिस काम की जरूरत नहीं थी वो भी जी-शेड्यूल में दिखाए? जवाब : सभी कार्यों का एस्टीमेट बनाने से लेकर, टेंडर करना और कार्य पूरा होने के बाद भुगतान तक की प्रक्रिया पिछले साल 31 मार्च तक पूरी की जानी थी। हमें महज 90 दिन मिल पाए थे, ऐसे में समसा को जितने कार्यों के लिए एजेंसी बनाया गया था, उसमे से अधिकांश कार्य पूरे करवा दिए हैं। समय कम होने से कुछ काम रह भी गए हैं। इसमें प्रत्येक स्कूल वार उस स्कूल की जरुरत के हिसाब से ही जी शेड्यूल तैयार करना था और इन दो लाख रुपए से बिल्डिंग को रिपेयर करना था। सवाल : जी-शेड्यूल में जो तय हुआ था, उसके अनुसार काम नहीं हुए, वेरिफिकेशन की जिम्मेदारी किसकी थी? जवाब : नहीं, जी शेड्यूल के अनुसार ही काम हुआ होगा, उसी के अनुसार बिल बना होगा। जिसमें कुछ क्वांटिटी में कई बार सेविंग रह जाती है और कुछ क्वांटिटी में एक्सेस भी हो जाता है। तो जो एक्सेस है, उसकी पावर के हिसाब से संबंधित अधिकारी ने अप्रूवल देकर काम करवाया होगा। फिर उसका वेरिफिकेशन इंजीनियरिंग डिपार्टमेंट की एजेंसी ने किया गया होगा। तो ऐसा भी नहीं है कि जी-शेड्यूल के बराबर काम नहीं हुआ। सवाल : डीडवाना-कुचामन जिले में ब्लॉक स्तर के शिक्षा अधिकारियों (सीबीईओ) को ही टेंडर की जिम्मेदारी सौंप दी गई? जवाब : इसकी मुझे कोई जानकारी नहीं हैं। हालांकि सीबीईओ लेवल को ये टेंडर करने का अधिकार नहीं हैं और न ही पावर है। …. पार्ट-1 की खबर यहां पढ़ें सरकारी स्कूलों में 503 करोड़ के फंड में फर्जीवाड़ा : छतों की दरारों में रंग भरकर छोड़ा, 5 जिलों 20 स्कूलों में पहुंचा रिपोर्टर, सामने आया सच झालावाड़ के पिपलोदी में स्कूल की छत गिरने से 7 मासूम बच्चों की दर्दनाक मौत हुई थी। सबक लेते हुए सरकार ने 503 करोड़ का बजट जारी किया। लेकिन जिम्मेदारों की नाक के नीचे ऐसा फर्जीवाड़ा हुआ, जिसने हजारों मासूमों की जिंदगी को फिर से खतरे में डाल दिया है…(CLICK कर पूरा पढ़ें)