राजस्थान हाईकोर्ट जोधपुर मुख्यपीठ ने पाली जिले के जवाई लेपर्ड सफारी में नए निर्माण पर पांबदी, खनन सहित होटल-रिसोर्ट के नए लाइसेंस जारी करने पर रोक लगा दी है। जस्टिस डॉ. पुष्पेंद्र सिंह भाटी और जस्टिस संदीप शाह की खंडपीठ ने मंगलवार को सुनवाई करते हुए यह आदेश दिए। कोर्ट ने जवाई लेपर्ड कंजर्वेशन रिजर्व और तेंदुओं की आवाजाही वाले पूरे लैंडस्केप में (गांवों की आबादी में वैध अनुमति वाले निर्माण को छोड़कर) किसी भी नए व्यावसायिक निर्माण और खनन गतिविधियों पर रोक लगाई है। कोर्ट ने लेपर्ड (तेंदुए) के प्राकृतिक आवास को सुरक्षित करने के मामले में सुनवाई के बाद यह 'रिपोर्टेबल' फैसला सुनाया है। कोर्ट ने वन विभाग की ओर से तैयार किए गए ड्राफ्ट 'स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर' (SOP) को तुरंत प्रभाव से लागू करने के निर्देश दिए हैं। साथ ही कोर्ट ने राज्य सरकार और वन्यजीव बोर्ड को इस क्षेत्र को 'अभयारण्य' घोषित करने पर विचार करने को कहा। कोर्ट ने कहा- धरती मनुष्य की नहीं, मनुष्य धरती का है कोर्ट की खंडपीठ ने फैसले की शुरुआत अंग्रेजी के कोट "The earth does not belong to man; man belongs to the earth." के साथ की। फैसले में संविधान के अनुच्छेद-21 के तहत 'जीवन' की व्याख्या करते हुए इसे प्रदूषण मुक्त और संतुलित पर्यावरण के अधिकार से जोड़ा गया। कोर्ट ने अनुच्छेद 48A और 51A(g) का हवाला देते हुए वन्यजीवों के संरक्षण को राज्य की संवैधानिक जिम्मेदारी और लोगों का मौलिक कर्तव्य बताया। जवाई क्षेत्र में हैं 50-70 लेपर्ड याचिकाकर्ता अपूर्वा अग्रावत की ओर से दायर जनहित याचिका में जवाई क्षेत्र की विशिष्ट ग्रेनाइट पहाड़ियों और गुफाओं को लेपर्ड्स के लिए अनूठा आवास बताया गया। इसमें याचिकाकर्ता ने बताया कि जवाई क्षेत्र में लेपर्ड्स की संख्या 50 से 70 के बीच है, जो इसे देश के सबसे घने लेपर्ड आवासों में से एक बनाता है। हालांकि अनियंत्रित ईको-टूरिज्म, अवैध खनन और लगातार हो रहे निर्माण से यह संतुलन बिगड़ रहा है। सुनवाई के दौरान सरकार की ओर से वकीलों ने बताया कि जवाई में लेपर्ड्स अधिकतर वन क्षेत्र से बाहर राजस्व और निजी भूमि पर हैं। इससे उनकी निगरानी में जटिलता आती है। याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि जब विलुप्त चीतों को बसाने के लिए बड़े प्रयास हो सकते हैं तो जवाई जैसे दुर्लभ प्राकृतिक आवास की रक्षा भी दृढ़ता से होनी चाहिए। हाईकोर्ट ने वन अफसरों के ड्राफ्ट को किया लागू अभयारण्य की दिशा में कदम: कोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिए कि वे वन्यजीव संरक्षण अधिनियम की धारा 8 और 18 के तहत इस क्षेत्र को 'अभयारण्य' घोषित करने की संभावना पर गंभीरता से विचार करें। वाहनों के प्रवेश पर रोक: जवाई बांध के मुख्य क्षेत्र और ओवरफ्लो जोन में वन्यजीवों व पक्षियों की सुरक्षा के लिए वाहनों के प्रवेश पर रोक लगा दी गई है। नाइट सफारी पहले की तरह पूरी तरह बंद रहेगी। इस मामले में याचिकाकर्ता अपूर्वा अग्रावत की ओर से अधिवक्ता करण सिंह शेखावत और महेंद्र कुमार गुर्जर ने पैरवी की। वहीं प्रतिवादी पक्ष (राज्य सरकार व अन्य) की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता महावीर बिश्नोई व सहयोगी अधिवक्ता हर्षवर्धन सिंह, अतिरिक्त महाधिवक्ता बी.एल. भाटी व सहयोगी अधिवक्ता दीपक चांडक, अतिरिक्त महाधिवक्ता एन.एस. राजपुरोहित की ओर से अतिरिक्त सहायक महाधिवक्ता अदिति शर्मा और केंद्र सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल व वरिष्ठ अधिवक्ता भरत व्यास मय सहायक अधिवक्ता टी.सी. शर्मा और अभिषेक अग्रवाल ने पक्ष रखा।