राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर मुख्यपीठ ने पारिवारिक विवादों से जूझ रहे सैकड़ों परिवारों के लिए एक बेहद व्यावहारिक और जनहितैषी फैसला सुनाया है। जस्टिस अरुण मोंगा और जस्टिस सुनील बेनीवाल की डिवीजन बेंच ने ‘न्याय में देरी, न्याय न मिलने के समान है’ के सिद्धांत को मानते हुए 75 लंबित अपीलों का तुरंत निस्तारण करते हुए हाईकोर्ट रजिस्ट्री को निर्देश दिया है कि वह इन्हें एकल पीठ रिट याचिकाओं के रूप में दोबारा दर्ज करे और कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश के निर्देशानुसार सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करे। कोर्ट ने हिंदू विवाह अधिनियम 1955 की धारा 24 के तहत दायर इन सभी डिवीजन बेंच अपीलों को अब एकल पीठ की रिट याचिकाओं में तब्दील करने का आदेश दे दिया है। इसका मतलब अब इन मामलों की सुनवाई जल्दी हो सकेगी और पक्षकारों को सालों तक इंतजार नहीं करना पड़ेगा। यह फैसला मुख्य अपीलार्थी कौशल्या सोनी (राजलदेसर, चुरू) बनाम रविकांत सोनी (अहमदाबाद) सहित 74 अन्य जुड़ी अपीलों पर एक साथ सुनाया गया। कानूनी इतिहास: तीन अलग-अलग पीठों के तीन विरोधाभासी मत दरअसल, 2010 में हाईकोर्ट ने ‘अजय मलिक बनाम शशि’ मामले में कहा था कि हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 24 (मुकदमे के दौरान भरण-पोषण और खर्च) के आदेश अंतरवर्ती हैं, इसलिए इनके खिलाफ अपील नहीं हो सकती। लेकिन आठ साल बाद 10 जनवरी 2018 में ‘कविता व्यास बनाम दीपक दवे’ पूर्ण पीठ ने 'अजय मलिक' की नज़ीर को गलत बताते हुए अपील को पोषणीय करार दिया। इसी आधार पर 2018 से 2026 तक 75 अपीलें दाखिल हुईं। फिर 27 मई 2022 को एक और खंडपीठ ने देखा कि 2018 के पूर्ण पीठ फैसले में सुप्रीम कोर्ट की बाध्यकारी नज़ीर ‘कैप्टन रमेश चंदर कौशल बनाम वीणा कौशल’ पर बिल्कुल ध्यान नहीं दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा था कि धारा 24 के आदेश अंतरवर्ती होते हैं। कोर्ट ने ‘पर इनक्यूरियम’ (असावधानीपूर्वक दिया गया फैसला) का सिद्धांत लागू करते हुए पूरा मामला वृहद पीठ को रेफर कर दिया। खंडपीठ का न्यायिक अनुशासन: निर्णय नहीं करेंगे, करना भी उचित नहीं जस्टिस अरुण मोंगा ने अहम टिप्पणी की — जब एक खंडपीठ ने पूर्ण पीठ के फैसले पर संदेह जताकर उसे लार्जर बेंच को रेफर कर दिया है, तो कोई समकक्ष खंडपीठ उस पर फैसला नहीं सुना सकता। यह न्यायिक अनुशासन की मांग है। ऐसा निर्णय लार्जर बेंच पर छोड़ा जाए। लेकिन समस्या ये थी कि मई 2022 का यह रेफरेंस चार साल से पेंडिंग पड़ा है और लार्जर पीठ का गठन अभी तक नहीं हुआ। जस्टिस मोंगा ने स्पष्ट किया कि "न्याय में देरी, न्याय न मिलने के समान है" के सिद्धांत को ध्यान में रखते हुए 2018 से लंबित अपीलों को और अधिक लटकाना पक्षकारों के साथ अन्याय होगा। पारिवारिक न्यायालय अधिनियम की धारा 19(4) और 19(5) के तहत इन आदेशों पर रिवीजन का भी कोई प्रावधान नहीं है। इसलिए कोर्ट ने अनुच्छेद 226 की व्यापक शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए फैसला लिया कि: