‘साल 1985 की बात है। जयपुर में एक बॉक्सर को बॉक्सिंग करते देखा था। दोस्त भी साथ थे, उन्हें कहा ये तो मैं आसानी से कर सकता हूं। ये बात बॉक्सिंग के कोच ने सुन ली और मुझे चैलेंज दे दिया। लड़कपन में कही बात मुझ पर भारी पड़ रही थी, पर मैंने हार नहीं मानी। बॉक्सिंग न आते हुए भी मैंने चैलेंज कबूल किया। हाथों में ग्लव्स पहनकर अंधाधुंध मुक्केबाजी करने लगा, जिससे मेरे सामने वाला खिलाड़ी गिर पड़ा। तब कोच ने मुझे कहा- तुम्हें बॉक्सिंग ही सीखनी है। तुम देश के लिए मैडल जीतोगे।’ ये किस्सा भास्कर को बॉक्सिंग कोच और द्रोणाचार्य अवार्ड से सम्मानित सागरमल धायल (58) ने बताया। इनके मार्गदर्शन में मैरी कॉम, विजेंद्र सिंह, लवलीना, सरिता देवी सहित कई बॉक्सर देश और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पदक जीत चुके हैं। इनके बेटा–बहू भी बॉक्सर हैं। रेलवे की टीम को ओलिंपिक के लिए तैयारियां करवा रहे अब ये राजस्थान में रेलवे की टीम को बॉक्सिंग की कोचिंग दे रहे हैं। भास्कर ने धायल से बात कर उनके जीवन और करियर की जर्नी को जाना। वर्तमान में 2021 के बाद से रेलवे की टीम को ओलिंपिक के लिए तैयारियां करवा रहे है। कोच सागरमल ने बताया- उनका जन्म 15 अगस्त 1968 को सीकर जिले के रींगस के पास कोटड़ी धायलान में हुआ था। पिता रामसिंह धायल किसान थे। बेटा सन्नी धायल और बहू नेहा धायल भी बॉक्सिंग में नेशनल मेडलिस्ट है। वर्तमान में बेटा रेलवे में टीटीई है और बहू पुत्रवधु पुलिस में सब इंस्पेक्टर है। उन्होंने कहा कि आमतौर पर कोच अपने बेटों को बॉक्सिंग नहीं सिखाते हैं, लेकिन उन्होंने अपने बेटे को इसके लिए तैयार किया और उन्होंने देश के लिए मैडल भी जीते है। पत्नी शारदा धायल का हमेश सपोर्ट रहा। स्कूल में खो-खो, कबड्‌डी और कई गेम खेलते थे सागरमल ने बताया– बचपन से स्पोर्ट के शौकीन रहे है। अपने गांव कोटड़ी में प्राइमरी स्कूल में पढ़ते थे, तब भी खो-खो सहित कई खेलों में हिस्सा लेते थे। आगे की पढ़ाई के लिए हॉस्टल में रहना शुरू किया तो कबड्डी खेलना शुरू किया। वहां से स्कूल की तरफ से नेशनल प्रतियोगिता में हिस्सा लिया था। दसवीं श्रीमाधोपुर से की थी। तब स्कूल की तरफ से कबड्डी में नेशनल खेला था। 1984 में 12वीं साइंस मैथ्स से किया था, जिसमें 72 प्रतिशत अंक आए थे। कॉलेज की पढ़ाई के लिए जयपुर गया था। 1985 में महाराजा कॉलेज में एडमिशन लिया था। किराए के कमरे में रहता था। कॉलेज में फुटबॉल, वॉलीबॉल और एथलेटिक्स खेलता था। बॉक्सिंग कोच के चैलेंज ने बदली जिंदगी सागरमल ने बताया कि उनके बॉक्सिंग की दुनिया में आने की शुरूआत बड़ी रोचक है। कॉलेज में गांव के लड़कों को देखकर एथलेटिक्स शुरू की थी। शुरुआत 5 हजार मीटर की दौड़ से की थी। SMS स्टेडियम में एथलेटिक्स के अलावा दूसरे गेम की भी प्लेयर कोचिंग लेते थे। एक बार दोस्तों के साथ बॉक्सिंग की कोचिंग को देखने लगे थे। तब एक कोच ने बॉक्सिंग करने का चैलेंज दिया था, जिसे पूरा किया था। कोच ने खुश होकर कहा था कि मुझे बॉक्सिंग करनी चाहिए। इसके बाद मूलसिंह शेखावत, आलोक कुमार, अनूप कुमार सहित कई कोच ने ट्रेनिंग दी थी। उन्होंने बताया कि उनकी बॉक्सिंग का खौफ इतना था कि यूनिवर्सिटी लेवल की प्रतियोगिता में कोई उनके सामने नहीं उतरता था। अब तक इतने मेडल जीत चुके कोच ने बताया कि 1988 में जूनियर नेशनल प्रतियोगिता में भाग लिया था, जिसमें चैंपियंस रहे थे। राजस्थान में ऑल इंडिया यूनिवर्सिटी प्रतियोगिता में भी उस समय मेडल जीतने वाले प्रदेश के पहले खिलाड़ी थे। 1988 में ही बेस्ट बॉक्सर का मेन सेक्शन में गोल्ड मेडल जीता था, जो आज भी रिकॉर्ड है। राजस्थान का कोई भी मूल निवासी, अब तक राजस्थान की ओर से खेलते हुए चैंपियन नहीं बना है। यह 34 साल से रिकॉर्ड है। 1988 के अंदर जूनियर प्रतियोगिता जिसे अब यूथ कहा जाता है, उसमें भी गोल्ड मेडल जीता था। साल 1991 में जमशेदपुर में सीनियर नेशनल चैंपियंशिप हुई थी, जिसमें गोल्ड मेडल जीता था। प्रदेश के मूल निवासी जो यही जन्में हो और राजस्थान के लिए खेले हो, उस रिकॉर्ड को आज तक कोई तोड़ नहीं सका है। इसके अलावा 37 सालों से जूनियर नेशनल चैंपियन का उनका रिकॉर्ड है। अब तक 700 से ज्यादा महिला, पुरुष बॉक्सर को ट्रेनिंग दे चुके हैं। बॉक्सर विजेंद्र सिंह ने उनके घर रहकर कोचिंग ली कोच सागरमल ने बताया कि 2006 तक 2018 तक इंडियन वुमेन टीम के कोच भी रहे। वहीं बॉयज टीम के भी चीफ कोच रहे। इंडियन मेन टीम के भी पिछले साल 2025 से कोच रहे, जिसमें विजेंद्र सिंह, दिलबाग सिंह, सन्नी धायल आदि को ट्रेनिंग दी। विजेंद्र सिंह ने तो 2004 से 2008 के बीच उनके घर पर 4 साल रहकर कोचिंग सीखी। महिला बॉक्सरों में सीमा पूनिया, मेरी कॉम, मीना रानी, पिंकी रानी, पवित्रा सहित कई प्रमुख खिलाड़ियों को ट्रेनिंग दे चुके हैं। देश को मेडल दिलाने में रहा सहयोग बॉक्सिंग में इंडिया को अब तक तीन मेडल मिले है, जिसमें उनका भी सहयोग रहा है। वर्ल्ड चैंपियनशिप, एशियन गैम्स, कॉमनवेल्थ गेम भी शामिल है। इन सबको जोड़ा जाए तो अब तक 20 वर्ल्ड चैंपियनशिप मेडल, 5 एशियन गेम्स, 3 कॉमनवेल्थ सहित 100 से अधिक स्कूली ओर नेशनल गेम्स में मैडल शामिल हैं। खेल में हार्ड वर्क और डिसिप्लिन जरूरी कोच ने कहा कि किसी भी क्षेत्र में जाओ वहां सबसे पहले हार्ड वर्क करना पड़ेगा। कड़ी मेहनत के बगैर सफलता नहीं मिलती है। इसके अलावा खेल में सफल होने के लिए धैर्य रखने के साथ ही परफॉर्मेंस बेहतर हो, इसके लिए भी प्रयास करना चाहिए। कड़ी मेहनत का कोई विकल्प नहीं है। आज कई नई तकनीक आ गई है जिसे सीखते हुए हार्ड वर्क को भी शामिल करें। हार्ड वर्क जब तक नहीं होगा सफलता नहीं मिलेगी। किसी भी फील्ड में सक्सेस होना हो तो धैर्य रखना आवश्यक है।