राजसमंद | युगप्रधान आचार्य महाश्रमण ने सुधर्मा सभा में मौजूद चतुर्विध धर्मसंघ को जहाज में सवार : पहुंचे भवपार विषय पर आगमवाणी के जरिए संबोधित किया। उन्होंने कहा कि संसार महासागर जैसा है। जीव शरीर रूपी नौका में सवार है। आश्रवयुक्त यानी छिद्र वाली नौका भवसागर के बीच डूब सकती है। निराश्रव यानी निश्छिद्र नौका ही जीव को भवसागर पार पहुंचा सकती है। उन्होंने कहा कि मनुष्य का औदारिक शरीर साधना का अहम साधन है। इसी शरीर से संयम, चारित्र, तप की आराधना हो सकती है। शरीर के जरिए अशुभ योग, पाप कर्मों की प्रवृत्ति होती है तो कर्मों का बंध होता है। संयमित जीवन जीने वाला व्यक्ति शरीर रूपी नौका को निश्छिद्र बनाने का प्रयास करता है।