भादवासी स्थित करुणामूर्ति धाम आश्रम में शुक्रवार को संतों के सानिध्य में रक्षाबंधन का महापर्व मनाया गया। इस अवसर पर बहनों और श्रद्धालुओं ने संतों को रक्षा सूत्र बांधकर आशीर्वाद लिया। पंडित ओमप्रकाश शास्त्री ने वैदिक मंत्रोच्चारण के साथ संतों को रक्षा सूत्र बांधा। आश्रम में पहुंचे अन्य श्रद्धालुओं ने भी संतों से आशीर्वाद प्राप्त किया। आश्रम के त्यागी संत हेतमराम महाराज ने इस अवसर पर कहा कि रक्षाबंधन हिंदू समाज का एक प्रमुख पर्व है। यह केवल सामान्य बंधन का दिन नहीं, बल्कि प्रेम, वात्सल्य और करुणा के बंधन का प्रतीक है। उन्होंने बताया कि रक्षा-बंधन का अर्थ रक्षा के लिए संकल्पित होना है, जो केवल एक दिन तक सीमित न रहकर जीवनभर प्राणी मात्र की रक्षा की प्रेरणा देता है। ‘सभी के प्रति मैत्री भाव रखना ही रक्षाबंधन की सच्ची भावना’ संत हेतमराम महाराज ने आगे कहा कि सभी के प्रति मैत्री भाव रखना ही रक्षाबंधन की सच्ची भावना है। यह पर्व हमें आत्मस्वरूप का चिंतन करते हुए जीव मात्र के प्रति करुणा और मैत्री का भाव रखने का संदेश देता है। उन्होंने इसे भाई-बहन के बीच पुराने राग-द्वेष मिटाकर नए मंगलमय जीवन की शुरुआत करने का शुभ अवसर भी बताया। त्यागी संत ने यह भी कहा कि रक्षाबंधन देश, धर्म और समाज की रक्षा का संदेश देने वाला पर्व है। इसमें बहन-बेटियों, साधु-संतों, परिवार के संस्कारों, गौवंश, पर्यावरण, पेड़-पौधों और हमारी परंपराओं की रक्षा का संकल्प भी शामिल है। ‘भाई-बहन का पवित्र रिश्ता निर्मल प्रेम का प्रतीक’ त्यागी संत नेमीराम महाराज ने अपने संबोधन में कहा कि भाई-बहन का पवित्र रिश्ता निर्मल प्रेम का प्रतीक है। प्रेम के इस बंधन से क्रोध शांत होता है और समता का भाव जागृत होता है। उन्होंने रक्षाबंधन को समाज के टूटे हुए मनों को जोड़ने और परिवार में आपसी कलह व दूरियां मिटाने का अवसर बताया। उन्होंने यह भी कहा कि जो लोग सांत्वना और स्नेह की आशा से जीवन जी रहे हैं, उन्हें सांत्वना और स्नेह देना चाहिए। पंडित ओमप्रकाश शास्त्री ने संतों को राखी बांधते हुए कहा कि जहां भाई लौकिक संपत्ति की रक्षा करते हैं, वहीं संत और गुरुजन आध्यात्मिक संपदा का संरक्षण करते हैं। वे साधना की रक्षा के साथ अनासक्ति और समता का मार्ग दिखाकर मनुष्य को कर्मबंधन से मुक्त होने की प्रेरणा देते हैं।