निगम चुनाव में भाजपा में भाई-भतीजावाद की दस्तक दिखाई देने लगी है। शहर के कई वार्डों से टिकट के लिए करीब 13 ऐसे नाम सामने आए हैं, जिन्हें पार्टी नेताओं ने भाई-भतीजे या रिश्तेदारों के लिए आगे बढ़ाया। इन नामों को विधायक, मंत्री और मंडल स्तर से तैयार पैनल में भी जगह मिल गई है। अब अंतिम फैसला सेंट्रल कमेटी करेगी। असली परीक्षा यहीं है कि नीचे से सिफारिश होकर पहुंचे इन नामों को केंद्रीय स्तर पर कितनी तवज्जो मिलती है। पार्टी लंबे समय से कार्यकर्ताओं को प्राथमिकता और जीत की क्षमता के आधार पर टिकट देने की बात कह रही है। ऐसे में यदि नेताओं के रिश्तेदारों को टिकट मिलते हैं तो यह सीधे तौर पर ‘कार्यकर्ता की मेहनत बनाम नेता की सिफारिश’ का मुद्दा बन सकता है। कई वार्डों में टिकट कटने वाले दावेदार बगावत कर सकते हैं और पार्टी को भीतरघात का नुकसान उठाना पड़ सकता है। कई कार्यकर्ताओं का कहना है कि संगठन में लंबे समय से काम करने वाले जमीनी कार्यकर्ताओं को टिकट मिलने चाहिए।