आईएएस श्रेया गुहा ने कहा है कि किसी समाज की पहचान सिर्फ उसके विकास, आधुनिक सुविधाओं और बदलती जीवनशैली से नहीं बनती। बल्कि उसकी असली पहचान उन कहानियों में छिपी होती है, जो पीढ़ियों से उसके लोगों, परंपराओं और जीवन के साथ आगे बढ़ती हैं। किसी परंपरा या समुदाय के बारे में किताबों में पढ़ी जानकारी तब और ज्यादा गहरी हो जाती है, जब उसे वास्तविक जीवन में अपनी आंखों के सामने घटित होते हुए देखा जाए। श्रेया गुहा एचसीएम रीपा के ऑडिटोरियम में बुधवार को आयोजित संवाद कार्यक्रम में बोल रहीं थीं। कार्यक्रम का आयोजन कार्टिस्ट की पहल स्टोरीज ऑफ इंडियन सिटीज के तहत किया गया। कार्यक्रम में एचसीएम रीपा की महानिदेशक श्रेया गुहा, दैनिक भास्कर की प्रेरणा साहनी और जाजम फाउंडेशन के निदेशक विनोद जोशी ने संवाद किया। संवाद का संचालन कार्टिस्ट के संस्थापक हिमांशु जांगिड़ ने किया। यहां देखिए इवेंट के फोटोज…
अपने अनुभव को साझा करते हुए श्रेया गुहा ने कहा- प्रशासनिक सेवा के शुरुआती दौर में उदयपुर में काम करने के दौरान मुझे एक आदिवासी क्षेत्र में ऐसा सामुदायिक आयोजन देखने का अवसर मिला, जिसके बारे में पहले किताबों में पढ़ चुकी थी। जंगल के रास्ते पैदल पहुंचकर उस समुदाय को अपनी परंपरा के साथ जीवंत रूप में देखा। मुझे ऐसा महसूस हुआ, जैसे किताब का कोई अध्याय अचानक मेरे सामने जीवित हो गया हो। उन्होंने इस अनुभव के माध्यम से यह सवाल भी सामने रखा कि जब हम विकास और आधुनिकता की बात करते हैं तो क्या हम अनजाने में उन जीवन-पद्धतियों को पीछे छोड़ रहे हैं। जिन्होंने सदियों से समुदायों की पहचान को बनाए रखा है? विकास जरूरी है, लेकिन स्मृतियां भी बचनी चाहिए श्रेया गुहा ने कहा- विकास और आधुनिक सुविधाएं निश्चित रूप से जरूरी हैं। समाज को आगे बढ़ना है, लोगों के जीवन को बेहतर बनाना है और नई सुविधाओं तक उनकी पहुंच सुनिश्चित करनी है। लेकिन विकास की इस प्रक्रिया में अगर पारंपरिक व्यवस्थाएं, स्थानीय ज्ञान और जीवन-पद्धतियां धीरे-धीरे खत्म होती चली जाएं तो समाज अपनी एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक स्मृति भी खो सकता है। उन्होंने कहा- चुनौती विकास को रोकने की नहीं, बल्कि विकास और विरासत के बीच संतुलन बनाने की है। किसी समुदाय की परंपरा केवल अतीत की चीज नहीं होती। उसमें उस समाज का ज्ञान, प्रकृति के साथ उसका संबंध, सामाजिक संरचना और पीढ़ियों से संचित अनुभव छिपा होता है। इसलिए इन कहानियों और परंपराओं को दर्ज करना और आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाना जरूरी है। कहानी सिर्फ मनोरंजन नहीं, समाज की स्मृति है संवाद में यह बात भी सामने आई कि कहानी को अक्सर मनोरंजन के माध्यम से देखा जाता है, जबकि उसका दायरा इससे कहीं बड़ा है। कहानी किसी व्यक्ति के जीवन, किसी समुदाय की परंपरा और किसी शहर की पहचान को सुरक्षित रखने का माध्यम बन सकती है। श्रेया गुहा के अनुभव ने इसी पहलू को सामने रखा कि अगर किसी संस्कृति को सिर्फ किताबों में दर्ज कर दिया जाए। उसे जीने वाले लोगों से उसका संपर्क टूट जाए तो उस संस्कृति की जीवंतता धीरे-धीरे खत्म हो सकती है। यही वजह है कि किसी समाज की कहानियों को दर्ज करना सिर्फ अतीत को सुरक्षित रखना नहीं, बल्कि वर्तमान को समझने और भविष्य की पीढ़ियों को अपनी जड़ों से जोड़ने का काम भी है। दिखने वाला व्यक्ति ही पूरी कहानी नहीं होता विनोद जोशी ने राजस्थान की फड़ चित्रकला और भोपा परंपरा से जुड़ा अनुभव साझा किया। उन्होंने कहा- एक बुजुर्ग भोपा, जो देखने में बेहद साधारण और आर्थिक रूप से कमजोर थे। जब बोलना शुरू हुए तो उनके ज्ञान और परंपरा की गहराई ने वहां मौजूद विशेषज्ञों को भी प्रभावित किया। इस अनुभव ने यह सवाल सामने रखा कि क्या हम किसी व्यक्ति के ज्ञान और महत्व का आकलन केवल उसकी वेशभूषा, सामाजिक स्थिति या औपचारिक शिक्षा के आधार पर कर सकते हैं? उन्होंने कहा- लोक परंपराओं को समझने के लिए उन लोगों तक पहुंचना जरूरी है, जो वास्तव में उन्हें पीढ़ियों से जीवित रखे हुए हैं। रिकी केज के उदाहरण से समझाई सफलता प्रेरणा साहनी ने पत्रकारिता के अनुभवों के माध्यम से बताया- किसी व्यक्ति की सार्वजनिक पहचान अक्सर उसकी पूरी कहानी नहीं होती। एक पत्रकार का काम केवल सवाल पूछना या उपलब्ध जानकारी को सामने रखना नहीं, बल्कि उस कहानी की उन परतों तक पहुंचना है। जो पहली नजर में दिखाई नहीं देतीं। उन्होंने संगीतकार रिकी केज का उदाहरण देते हुए बताया- एक सफल कलाकार की पहचान के पीछे उसके संघर्ष, सीखने की प्रक्रिया और व्यक्तिगत अनुभवों की भी अपनी कहानी होती है। ऐसे अनुभव यह बताते हैं कि किसी व्यक्ति को समझने के लिए उसके जीवन के पूरे सफर को जानना जरूरी है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि हर व्यक्ति के पीछे एक ऐसी कहानी हो सकती है, जो उसकी सार्वजनिक पहचान से कहीं अधिक गहरी और मानवीय हो।