22 साल तक नहीं हुए थे चुनाव नगर निकायों में परिसीमन समेत अन्य विवादों के चलते 22 साल तक चुनाव नहीं हुए। इनमे झुंझुनूं, बिसाऊ और पिलानी में 1972 से 1993 तक चुनाव नहीं हुए। 1994 में फिर से चुनाव हुए। जिसमें झुंझुनूं, बिसाऊ व पिलानी नगर पालिका शामिल रही। इन तीन निकाय के चुनाव नवंबर में होते। जबकि आठ निकायों के चुनाव में अलग समय में होते रहे हैं। नवंबर 2019 में बने बोर्ड का कार्यकाल 25 नवंबर 2024 को समाप्त हो गया था। इसके बाद से ही शासन ने आरएएस अधिकारी अजय कुमार को प्रशासक नियुक्त कर रखा है। करीब दो साल बाद जनता और जनप्रतिनिधियों दोनों में चुनाव को लेकर भारी उत्सुकता है। इस बार सभापति का पद अनारक्षित होने के कारण दोनों ही प्रमुख दलों (भाजपा और कांग्रेस) में दावेदारों की लंबी कतार है। मोहम्मद मुस्लिम | झुंझुनूं राजस्थान की राजनीति में हर पांच साल में सरकार बदलने का रिवाज है। वैसे ही झुंझुनूं नगर परिषद का भी अपना एक अनोखा सियासी ट्रेंड है। पिछले करीब तीन दशकों (30 साल) से झुंझुनूं शहर में एक दिलचस्प मिथक कायम है-प्रदेश में जिस पार्टी की सरकार होगी, झुंझुनूं नगर परिषद में बोर्ड भी उसी पार्टी का बनेगा। यह सिलसिला 1994 से लेकर 2019 के निकाय चुनाव तक लगातार 6 बार दोहराया जा चुका है। अब एक बार फिर निकाय चुनावों की आहट के साथ शहर के राजनीतिक चौपालों में सबसे ज्यादा चर्चा इसी बात की है कि क्या इस बार भी सत्ता के साथ बोर्ड वाला 30 साल पुराना ट्रेंड बरकरार रहेगा या यह मिथक टूटेगा? झुंझुनूं नगर परिषद के इस दिलचस्प ट्रेंड 1994 में शुरू हुआ और आज तक जारी है। यानी 1994 के बाद हुए सभी निकाय चुनावों में यह पैटर्न कायम रहा। निकाय चुनावों को देखें तो प्रदेश में सत्ता बदलने के साथ झुंझुनूं नगर परिषद का राजनीतिक रंग भी बदलता रहा। भाजपा की सरकार के दौरान भाजपा का बोर्ड बना तो कांग्रेस सरकार के समय कांग्रेस ने नगर परिषद में सत्ता संभाली। भाजपा के सामने चुनौती : प्रदेश में सत्ता होने के नाते 30 साल पुराने इस मिथक को कायम रखने और अपना चौथा बोर्ड बनाने का दबाव। कांग्रेस के सामने अवसर: विपक्ष में रहते हुए इस तीन दशक पुराने सियासी गणित को तोड़कर पहली बार विपक्षी बोर्ड बनाने का इतिहास रचने का मौका। पिछले छह चुनावों को देखे तो झुंझुनूं नगर परिषद में तीन बार भाजपा के और तीन बार कांग्रेस के सभापति बने हैं। 1994 में भाजपा के रमेश टीबड़ा, 1999 में कांग्रेस के तैय्यब अली चेयरमैन बने। 2004 में भाजपा की भारती टीबड़ा और 2009 में कांग्रेस के खालिद हुसैन सभापति बने। 2014 में भाजपा के सुदेश अहलावत सभापति बने। 2019 में कांग्रेस की नगमा बानो सभापति बनी। इस बार सभापति का पद अनारक्षित है, यानी कोई भी सभापति बन सकता है। चुनावी व्यवस्था बदली, पर नहीं बदला झुंझुनूं का ट्रेंड झुंझुनूं नगर परिषद की खासियत यह रही कि चुनाव की प्रक्रिया चाहे बदल गई हो, लेकिन परिणाम का ट्रेंड नहीं बदला। 2009 में जब सभापति का चुनाव सीधे जनता के माध्यम से करवाया, तब भी प्रदेश में सत्तासीन कांग्रेस के खालिद हुसैन जीते। वहीं जब पार्षदों के जरिए सभापति चुने गए, तब भी बाजी उसी पार्टी ने मारी जिसकी प्रदेश में सरकार थी। अब तक के ट्रेंड में देखने में आया कि पिछले छह चुनाव में कांग्रेस का बोर्ड बनने पर अल्पसंख्यक को ही अध्यक्ष बनाया गया है। जबकि भाजपा के तीन बार बने बोर्ड में दो बार महाजन को व एक बार जाट को चेयरमैन बनाया गया है। नगर परिषद इलाके में 93 हजार मतदाता हैं। इसमें करीब 33% अल्पसंख्यक समुदाय के हैं। इनके 24-28 पार्षद जीतकर आते हैं। परिसीमन के बाद अब अल्पसंख्यक पार्षदों की संख्या में 7 से 8 कम होने की संभावना है। जाट समाज के 10 से 11 पार्षद जीतकर आते हैं। इस बार यह संख्या 15-20 तक पहुंचने की संभावना है। सैनी समाज के 5 पार्षद जीतकर आते हैं। इस बार भी यह आंकड़ा इतना ही रहने की संभावना है। महाजन वर्ग के दो पार्षद व ब्राह्मण समाज के 4 पार्षद जीतकर आते हैं। इस बार जाट व अल्पसंख्यक के बनने की संभावना है।