हॉकी के मैदान पानी बचाने की सबसे बड़ी वैश्विक प्रयोगशाला बनने जा रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय हॉकी महासंघ (एफआईएच) ऐसी ‘ड्राई टर्फ’ तकनीक विकसित कर रहा है, जिस पर बिना नियमित सिंचाई के भी विश्वस्तरीय हॉकी खेली जा सकेगी। यह तकनीक पूरी तरह सफल रही तो 90 मिनट के एक मैच में करीब 20,000 लीटर पानी की बचत होगी। नया ड्राई टर्फ सिस्टम चार लेयर्स में तैयार होगा। इसमें पहली लेयर- सबसे ऊपर फाइबर की कृत्रिम सतह होगी, जिस पर गेंद रोल करेगी। दूसरी- जियोफिल की सतह होगी, जो फाइबर को मजबूती और आवश्यक सपोर्ट देगी। तीसरी- रेत की सतह होगी, जो पूरे मैदान को मजबूती और स्थिरता देगी। चौथी- शॉक पैड की सतह होगी, जो खिलाड़ियों को चोट से बचाने व झटके सोखने के लिए कुशनिंग करेगी। इस बदलाव की सबसे बड़ी वजह संयुक्त राष्ट्र जल विकास रिपोर्ट है। जिसमें बताया गया है कि दुनिया में 2.2 अरब लोगों के पास सुरक्षित पेयजल नहीं है। 3.5 अरब के पास स्वच्छता सुविधाएं नहीं हैं। विश्व कप की मेजबानी कर रहा बेल्जियम भी इससे जूझ रहा है। गणित समझिए: एक मैच में बचा पानी हमारे लिए कितना जरूरी है 18 साल का कोटा: 20 हजार लीटर पानी एक व्यक्ति की 3 लीटर रोज की पेयजल जरूरत के हिसाब से करीब 18 साल के पीने के पानी के बराबर होता है। जानिए... 1976 से अब तक कैसे बदला खेल 1976 मॉन्ट्रियल ओलिंपिक: पहली बार प्राकृतिक घास की जगह सिंथेटिक टर्फ लगा। सैंड-बेस्ड टर्फ दौर: स्थिरता के लिए रेत आधारित टर्फ का इस्तेमाल वाटर-बेस्ड टर्फ दौर: तेज खेल के लिए पानी वाला टर्फ बना अंतरराष्ट्रीय मानक ड्राई टर्फ (भविष्य): जल संकट से निपटने के लिए बिना पानी वाली नई तकनीक। तकनीक रिसर्च स्टेज पर; जूते, गेंद और खेलने की शैली सब बदलेगी पानी बचाने की यह शानदार पहल है, लेकिन इसमें कई तकनीकी चुनौतियां हैं। सूखे टर्फ पर बॉल की स्पीड धीमी होगी, घर्षण बढ़ेगा और खिलाड़ियों में इंजरी का खतरा रहेगा। इसके लिए जूते, गेंद और खेलने की शैली सब बदलनी होगी। 8 साल के ट्रायल के बाद अभी 10 से 15% सफलता मिली है। इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लागू होने में 2032 ओलिंपिक के बाद का समय लग सकता है। -हरेंद्र सिंह, पूर्व मुख्य कोच, भारतीय हॉकी टीम, एफआईएच के सदस्य वर्ष 2028 तक राष्ट्रीय स्तर के मैच में लागू कर सकता है एफआईएच दुनिया भर में जल संकट गहरा रहा है। आने वाले समय में पानी सबसे कीमती संसाधन होगा। हॉकी दुनिया का पहला खेल बनने जा रहा है, जो पानी बचाने के लिए वैश्विक स्तर पर अपने नियम और संसाधन बदल रहा है। पूरी संभावना है कि एफआईएच इसे वर्ष 2028 तक बड़े स्तर पर लागू करने की दिशा में ठोस कदम उठा लेगा। -दीपक खनोलकर, को-फाउंडर, अकोसा स्पोर्ट्स इंफ्रास्ट्रक्चर सर्विसेज