देश में 53 साल पहले शहीद हुए 35 सैनिकों के परिवारों को सरकारी नौकरी देने का रास्ता खुल गया है, लेकिन जिन परिवारों को इस फैसले का लाभ मिलना है, उनकी पहचान तक जिम्मेदार विभागों के पास नहीं है। राजस्थान सैनिक कल्याण निदेशालय ने सरकार से नियमों में संशोधन का प्रस्ताव पारित करवा लिया, मगर अब उसके पास न इन 35 शहीदों के नाम-पते हैं, न ही उनके आश्रितों का ब्योरा। दैनिक भास्कर ने जयपुर समेत एक दर्जन से अधिक जिला सैनिक कल्याण कार्यालयों में पड़ताल की, लेकिन कहीं भी ऑपरेशन कैक्टस लिलि के इन शहीदों के आश्रितों का कोई प्रकरण प्रक्रियाधीन नहीं मिला। ऐसे में सवाल है कि जब निदेशालय और जिला कार्यालयों के पास 35 शहीद परिवारों की जानकारी ही नहीं है, तो सरकार को नियमों में संशोधन का प्रस्ताव किन जानकारियों के आधार पर भेजा गया? निदेशालय का कहना है कि जैसे-जैसे आश्रितों के प्रस्ताव आएंगे, उन्हें आगे बढ़ाया जाएगा। यानी 53 साल बाद नौकरी का रास्ता तो खुला, लेकिन जिन परिवारों के लिए यह फैसला हुआ, उन्हें तलाशने का ब्योरा ही विभाग के पास नहीं है। हमने कानून में बदलाव करवाया, ताकि सभी परिवारों को संबल मिले राजस्थान सैनिक कल्याण निदेशक ब्रिगेडियर सुरेंद्र सिंह का कहना है कि निदेशालय ने 35 शहीदों के परिवारों को नौकरी देने का प्रस्ताव तैयार किया था। सरकार ने नियमों में बदलाव कर दिया है, लेकिन परिवारों के नाम उनके पास नहीं हैं। जिलों से जैसे-जैसे प्रस्ताव आएंगे, उन्हें आगे बढ़ाते जाएंगे। उनका कहना है कि उद्देश्य वर्ष 1971-72 के बाद से नौकरी की उम्मीद लगाए बैठे सभी परिवारों के आश्रितों को नियुक्ति दिलाना है। ऑपरेशन कैक्टस लिलि: वॉर हीरो की पहचान तक नहीं दैनिक भास्कर ने जयपुर के साथ बाड़मेर, बालोतरा, ब्यावर, भीलवाड़ा, चित्तौड़गढ़, अजमेर, सीकर, चूरू, झुंझुनूं, नीमकाथाना, कोटा, नागौर, भरतपुर एवं भीम के सैनिक कल्याण कार्यालयों में संपर्क किया। इन कार्यालयों में ऑपरेशन कैक्टस लिलि में घायल होने के बाद इलाज के दौरान शहीद हुए सैनिकों के आश्रितों का कोई प्रकरण संज्ञान में नहीं आया। नीमकाथाना सैनिक कल्याण अधिकारी रिटायर्ड कर्नल रघुनाथ सिंह शेखावत ने बताया कि उनके यहां ऐसा कोई प्रकरण नहीं है। उन्होंने कहा कि यदि कोई आश्रित आता है, तो उसे आगे भेजा जाएगा। वहीं, ब्यावर सैनिक कल्याण अधिकारी रिटायर्ड कर्नल महेंद्र सिंह ने बताया कि घायल होने के बाद शहीद हुए सैनिक का कोई प्रकरण उनके यहां नहीं है। हालांकि, इसी युद्ध में शहीद मिट्ठू के आश्रित का प्रकरण कलेक्टर के पास विचाराधीन है। ब्यावर जिले के मेडाडा (मेडिया) गांव के रहने वाले मिट्ठू भारत-पाक युद्ध के दौरान दिसंबर 1971 में शहीद हुए थे। पुराने नियमों से 35 परिवार रह गए थे वंचित सैनिक कल्याण निदेशालय ने ऑपरेशन कैक्टस लिलि (भारत-पाक युद्ध-1971) में भारतीय सशस्त्र सेनाओं के उन सैनिकों के परिवारों को अनुकंपा नियुक्ति देने के लिए नियमों में संशोधन का प्रस्ताव दिया, जो युद्ध में घायल हुए और बाद में इलाज के दौरान उनकी मृत्यु हो गई। राजस्थान मृत सशस्त्र बल कार्मिक (शहीद) के आश्रितों को नियुक्ति नियम-2022 के तहत पहले 15 अगस्त 1947 से 31 दिसंबर 1971 के दौरान वीरगति प्राप्त करने वाले और सेना की ओर से बैटल कैजुअल्टी घोषित सैनिकों के परिवार के एक सदस्य को नौकरी देने का प्रावधान था। भारत-पाक युद्ध दिसंबर 1971 में समाप्त हो गया था, लेकिन दुश्मन के साथ झड़पों या ऑपरेशन में घायल हुए कुछ सैनिकों की इलाज के दौरान 1 जनवरी 1972 से 31 अक्टूबर 1972 के बीच मृत्यु हुई थी। पुराने नियमों के दायरे में नहीं आने से ऐसे 35 सैनिकों के परिवार अनुकंपा नियुक्ति के लाभ से वंचित रह गए। दो साल पहले फैसला, अब संशोधन शहीद सैनिक परिवारों को करीब 53 साल बाद राहत मिलने का रास्ता तब खुला, जब दो साल पहले भाजपा सरकार ने नियमों में संशोधन का फैसला किया। तय किया गया कि 31 अक्टूबर 1972 तक घायल होने के बाद उपचार के दौरान वीरगति प्राप्त करने वाले सैनिकों के आश्रितों को भी अनुकंपा नियुक्ति दी जाएगी। बजट में घोषणा और कैबिनेट के फैसले के बाद कार्मिक विभाग ने राजस्थान मृत सशस्त्र बल कार्मिक (शहीद) के आश्रितों को नियुक्ति नियम-2022 में संशोधन कर दिया। 361 में से 35 घायलों की बाद में हुई मृत्यु राजस्थान सैनिक कल्याण निदेशालय के अनुसार, ऑपरेशन कैक्टस लिलि में राजस्थान के कुल 361 सैनिक शहीद हुए थे। इनमें 326 सैनिक युद्ध के दौरान शहीद हुए, जबकि 35 सैनिक ऑपरेशन के दौरान घायल हुए थे और बाद में उनकी मृत्यु हो गई। राज्य सरकार ने इन परिवारों को भी अनुकंपा नियुक्ति देने का फैसला किया। बजट घोषणा और कैबिनेट की मंजूरी के बाद नियमों में संशोधन भी हो गया। इसके बावजूद निदेशालय के पास इन 35 परिवारों की पहचान और आश्रितों का ब्योरा नहीं है।