आरएएस-2024 के परिणाम सिर्फ चयन सूची नहीं, संघर्ष और सपनों की कहानियां भी हैं। कई अभ्यर्थियों के पास पढ़ाई के लिए संसाधन तक नहीं थे। कहीं माता-पिता ने जेवर गिरवी रखे, तो कहीं भेड़-बकरियां बेचकर फीस जुटाई। आर्थिक तंगी के बावजूद इन युवाओं ने हौसला नहीं छोड़ा और मेहनत के दम पर मंजिल हासिल की। सीमित साधनों में पले इन होनहारों ने साबित किया कि हालात कितने भी कठिन क्यों न हों, मजबूत इरादे सफलता का रास्ता बना ही देते हैं। जलने के कारण हाथ काटने पड़े थे, मां-पिता का हौसला; दिव्यांग कोटे में चौथी रैंक महवा | सलेमपुर के राजवीर सिंह गुर्जर ने जिद और परिवार के साथ से सफलता की नई कहानी लिखी। 2005 में खेलते समय हुए विस्फोटक हादसे में दोनों हाथ गंवा दिए। आंखों की रोशनी भी कमजोर हो गई। बिना कोचिंग सेल्फ स्टडी की। 2021 में इंटरव्यू तक पहुंचे, पर चयन नहीं हुआ। दूसरे प्रयास में आरएएस बन गए। पिता विक्रम सिंह और मां अंगूरी देवी हर कदम पर साथ रहे। पिता भेड़ पालते हैं, इसी से घर चलता; कोचिंग करना मुश्किल था, जीजा ने मेरी फीस भरी बीकानेर| छनेरी के लोकेंद्र सिंह ने 33वीं रैंक हासिल की है। लोकेंद्र के लिए सबसे बड़ी चुनौती पैसे की कमी थी। पिता भेड़-बकरी पालन करते हैं और पशु बेचकर ही पढ़ाई का खर्च भेज पाते थे। कोचिंग और जयपुर में रहना भी मुश्किल था, तब रिटायर्ड फौजी जीजा ने फीस भरकर सहारा दिया। पिता ने बकरी चरा परिवार पाला; बेटे ने सम्मान बढ़ाया बसवा | छापोला ढाणी निवासी सुशील मीणा का आरएएस में चयन हुआ है। पिता छुटटनलाल ने बकरी चराकर परिवार का गुजारा किया है। पिता ने बताया कि सुशील का आरएएस में एसटी में प्रदेश में तीसरा स्थान है।