अलवर जिला अस्पताल की सेंट्रल लैब इन दिनों बेहद जर्जर हालत में पहुंच चुकी है, जिससे कभी भी बड़ा हादसा हो सकता है। लैब की दीवारों में गहरी दरारें पड़ चुकी हैं और करीब 90 प्रतिशत टाइल्स उखड़ चुकी हैं। कई जगहों पर प्लास्टर गिर चुका है और ईंटें बाहर दिखाई देने लगी हैं, जिससे यहां काम कर रहे कर्मचारियों और जांच के लिए आने वाले मरीजों में डर का माहौल बना हुआ है। इस सेंट्रल लैब का उद्घाटन 6 अप्रैल 2013 को हुआ था, लेकिन समय के साथ इसकी स्थिति लगातार बिगड़ती चली गई। पिछले कई सालों से बिल्डिंग में दरारें बढ़ रही हैं और अब हालत यह है कि पीछे की तरफ से बिल्डिंग फटती नजर आ रही है। उप्पर छत पर भी साइड की दिवारे टूट गई हैं। अस्पताल प्रशासन ने लोक निर्माण विभाग (PWD) को मेंटेनेंस कार्य के लिए कई बार पत्र लिखे हैं, ताकि मरम्मत का स्टिमेट तैयार कर बजट पास कराया जा सके। लेकिन एक साल में तीन बार पत्र भेजने के बावजूद PWD की ओर से कोई ठोस जवाब नहीं मिला है, जिससे काम अटका हुआ है। जांच करवाने आए मरीज प्रेमचंद मीणा का कहना है कि वे इलाज के लिए तो आए हैं, लेकिन लैब की हालत देखकर डर लग रहा है कि कहीं कोई हादसा न हो जाए। उन्होंने प्रशासन से समय रहते कदम उठाने की मांग की है। वहीं पीएमओ डॉ. प्रवीण शर्मा ने बताया कि फिलहाल लैब को शिफ्ट करना संभव नहीं है, क्योंकि अस्पताल में पर्याप्त जगह उपलब्ध नहीं है। उन्होंने कहा कि सेंट्रल लैब में पैथोलॉजी और बायोकेमिस्ट्री की मशीनें बेहद संवेदनशील होती हैं, जिन पर धूल का असर पड़ सकता है, इसलिए बिना उचित व्यवस्था के शिफ्टिंग करना जोखिम भरा है। उन्होंने यह भी बताया कि PWD को कई बार पत्र लिखे जा चुके हैं, लेकिन अभी तक कोई जवाब नहीं मिला है। इस सेंट्रल लैब में रोजाना सैकड़ों मरीज जांच के लिए पहुंचते हैं, जिनकी सुरक्षा अब सवालों के घेरे में है। सफाई कर्मचारी के अनुसार, सफाई के दौरान दीवारों से लगातार मलबा झड़ता रहता है। ऐसे में बड़ा सवाल यही है कि क्या प्रशासन किसी बड़े हादसे का इंतजार कर रहा है या समय रहते इस खतरनाक स्थिति का समाधान किया जाएगा।