बारां नगर परिषद के चर्चित भूखंड पट्टा घोटाले में पूर्व सभापति ज्योति पारस और तत्कालीन नगर परिषद आयुक्त रिंकल गुप्ता को झटका लगा है। अदालत ने दोनों की अग्रिम जमानत याचिकाएं खारिज कर दी हैं। कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि प्रथम दृष्टया रिकॉर्ड से यह सामने आता है कि सरकारी जमीन को आपराधिक षड्यंत्र के तहत फर्जी दस्तावेज तैयार कर औने-पौने दाम पर पट्टा जारी किया गया। इससे सरकारी संपत्ति के गबन का मामला बनता है। औने-पौने दाम में बेची बेशकीमती जमीन यह मामला कोतवाली थाने में दर्ज एफआईआर से संबंधित है। परिवादी तेजेश सुमन ने आरोप लगाया था कि अस्पताल रोड स्थित नगर परिषद का करीब 1500 वर्गफीट का खाली सरकारी भूखंड, जिसकी बाजार कीमत लगभग डेढ़ करोड़ रुपए थी, उसे हड़प लिया गया। आरोप के अनुसार इस बेशकीमती भूखंड का पट्टा फर्जी दस्तावेज, नक्शे और रिकॉर्ड तैयार कर मात्र 28 रुपए प्रति वर्गफीट की दर से जारी किया गया था। शिकायत में तत्कालीन आयुक्त रिंकल गुप्ता, तत्कालीन सभापति ज्योति पारस सहित अन्य लोगों पर मिलीभगत का आरोप लगाया गया है। सुनवाई के दौरान, बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि यह मामला राजनीतिक दुर्भावना से दर्ज कराया गया है और संबंधित पट्टा पहले ही निरस्त किया जा चुका है। वहीं, अभियोजन पक्ष ने अदालत को बताया कि पट्टा निरस्त होने से अपराध समाप्त नहीं हो जाता। जांच में सामने आया है कि मौके पर खाली भूखंड होने के बावजूद फर्जी नक्शे और शपथ पत्रों के आधार पर पुराने मकान का रिकॉर्ड तैयार कर पट्टा जारी किया गया था। कोर्ट ने अग्रिम जमानत याचिकाएं खारिज की अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि जांच के दौरान उपलब्ध सामग्री से प्रथम दृष्टया यह साबित होता है कि सरकारी भूमि को फर्जी दस्तावेजों के आधार पर बेचे जाने की साजिश रची गई। अदालत ने यह भी माना कि मामले की जांच अभी जारी है और पट्टा निरस्त किए जाने से आपराधिक दायित्व समाप्त नहीं होता। इन परिस्थितियों में अग्रिम जमानत देना न्यायोचित नहीं माना जा सकता। इसके बाद अदालत ने रिंकल गुप्ता और ज्योति पारस दोनों की अग्रिम जमानत याचिकाएं खारिज कर दीं।