प्रदेश में एचपीवी वैक्सीनेशन चल रहा है। 28 फरवरी को इसकी शुरुआत पीएम नरेंद्र मोदी ने अजमेर में की थी। यह टीका बेटियों को सर्वाइकल कैंसर से बचाने के लिए निशुल्क लगाया जा रहा है। चौंकाने वाली बात यह है कि प्रदेश में 38 दिन में सिर्फ 0.61% टीकाकरण हुआ है। 28 फरवरी से अब तक 2112 टीकाकरण सेशन में महज 5064 बेटियों को टीके लगाए गए हैं। अभियान के दौरान 8.32 लाख बेटियों का टीकाकरण होना है। 41 में से 35 जिलों में टारगेट का 1% टीकाकरण भी नहीं हुआ। सबसे ज्यादा टीकाकरण बारां जिले में हुआ है, लेकिन वहां का आंकड़ा भी काफी कम है। यहां 14944 में से 412 को टीका लगा है। प्रदेश में सबसे कमजोर स्थिति करौली की है। यहां 18665 के लक्ष्य के मुकाबले अब तक 14 बेटियों को टीका लगाया जा सका है। जयपुर प्रथम और द्वितीय में भी स्थिति कमजोर है। दोनों जगह 75 हजार टीके लगने हैं और अब तक 159 ही लग पाए हैं। अभियान जब शुरू हुआ, तो स्कूलों में परीक्षाएं थीं। इसके बाद स्कूलों की छुट्टियों से टीकाकरण की प्रगति कमजोर रही। कई सीमावर्ती जिलों में अफवाह के चलते लोग टीके से बच रहे हैं। विभाग लोगों को जागरूक कर रहा है। दूसरे विभागों का सहयोग लेते हुए रफ्तार बढ़ाएंगे। - डॉ. रघुराज सिंह, प्रोजेक्ट डायरेक्टर, टीकाकरण एक्सप्लेनर : 1 डोज पर 6600 रु. का खर्च, 41 डिपो में हैं 2.25 लाख वायल गार्डासिल कंपनी की वैक्सीन सप्लाई हुई है। एक डोज 4700 रु. की है। ट्रांसपोर्टेशन, स्टाफ की ड्यूटी और कोल्ड चेन पॉइंट पर रखरखाव समेत एक टीका लगाने पर औसतन 6600 रु. खर्च आता है। मार्च के शुरू में 2.25 लाख वायल मिलीं। इन्हें अब संबंधित जिलों के वैक्सीन डिपो और कोल्ड चेन पॉइंट पर रखा हुआ है। कोल्ड चेन पॉइंट पर टेंपरेचर मेंटेन नहीं रहने पर खतरा रहता है, क्योंकि ये दूर-दराज की सीएचसी पर भी बनाए गए हैं। धीमी रफ्तार के 4 प्रमुख कारण प्रचार की कमी : टीका लगवाने में बेटियां व उनके पेरेंट्स संकोच कर रहे हैं। स्वास्थ्य विभाग व फील्ड में लगे हुए कर्मचारी इसके फायदे बताने में नाकाम साबित हुए हैं। स्कूलों, अस्पतालों और सार्वजनिक जगहों पर प्रचार नहीं किया गया और न ही प्रमुख इलाकों में पोस्टर लगाए गए। दूसरी बीमारियों को रोकने के लिए गांव-गांव नुक्कड़ नाटक कराए जाते हैं, लेकिन यह तरीका भी नहीं अपनाया गया। जनता में जागरूकता नहीं : सर्विक्स कैंसर महिलाओं में दूसरा सबसे आम कैंसर है। इसकी वजह ह्यूमन पैपिलोमा वायरस संक्रमण है। महिलाओं में इसे लेकर जागरूकता की कमी है। संकोच और नियमित स्क्रीनिंग न कराने के कारण लास्ट स्टेज में बीमारी का पता चलता है। डॉक्टर्स-नर्सिंग स्टाफ की लापरवाही : स्वास्थ्य विभाग से जुड़े डॉक्टर, नर्सिंग ऑफिसर और पैरामेडिकल स्टाफ भी टीके के फायदे गिनाने में रुचि नहीं ले रहे हैं। लिहाजा टीकाकरण को लेकर ज्यादा उत्साह नहीं दिख रहा है। स्टाफ ओपीडी और आईपीडी में आमजन को इस वैक्सीन के फायदे बताए, तो प्रगति में सुधार हो सकता है। वैक्सीन को लेकर कुछ अफवाहें : वैक्सीन को लेकर ग्रामीण इलाकों में कई तरह की चर्चाएं हैं। कुछ इलाकों में यह अफवाह है कि वैक्सीन लगाने से बांझपन का खतरा बढ़ेगा, तो कहीं कहा जा रहा है कि यह टीका लगवाने के बाद कोविड वैक्सीन जैसे साइड इफेक्ट होंगे। ये अफवाहें पश्चिमी राजस्थान के जिलों में सबसे ज्यादा हैं।