ड्राइविंग लाइसेंस टेस्ट की रिपोर्ट ने परिवहन विभाग की व्यवस्था पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। जयपुर में जहां ऑटोमेटेड ट्रैक वाले आरटीओ प्रथम में दो माह में सिर्फ 620 लाइसेंस बने, वहीं मैनुअल टेस्ट लाइसेंस बना रहे आरटीओ सेकंड ने 12,961 लाइसेंस जारी हो गए। यह फर्क सिर्फ आंकड़े का नहीं, बल्कि पास-फेल अनुपात का भी है। फर्स्ट में लाइसेंस बनवाने पहुंचे 62% अभ्यर्थी फेल हो गए, जबकि सेकंड में 99% के लाइसेंस बन गए। 1 फरवरी से 31 मार्च 2026 के बीच आरटीओ प्रथम स्थित ऑटोमेटेड ट्रैक पर 1,630 आवेदन आए, लेकिन लाइसेंस सिर्फ 620 बने। इसके उलट आरटीओ सेकंड में 13,080 आवेदन आए और 12,961 लाइसेंस जारी कर दिए गए। बता दें कि जिले में सिर्फ आरटीओ फर्स्ट में ऑटोमेटेड ड्राइविंग टेस्ट ट्रैक है। रिपोर्ट से यह संकेत मिल रहा है कि ऑटोमेटेड टेस्टिंग में फेल होने के डर से अभ्यर्थी दूसरे कार्यालयों का रुख कर रहे थे। परिवहन विभाग के अधिकारियों के अनुसार, जिन केंद्रों पर मैन्युअल प्रक्रिया है, वहां लाइसेंस की संख्या ज्यादा रही। अब ‘पिनकोड लॉक’ सिस्टम लागू किया पास प्रतिशत में इस बड़े अंतर के बाद टेस्टिंग प्रक्रिया की एकरूपता पर सवाल उठे हैं। इसी गड़बड़ी को देखते हुए परिवहन विभाग ने अब ‘पिन कोड लॉक’ सिस्टम लागू कर दिया है। अब टेस्ट ट्रैक वाले जिलों में आवेदक केवल अपने क्षेत्राधिकार वाले आरटीओ में ही आवेदन कर सकेंगे। इससे दलालों की भूमिका सीमित होगी और अभ्यर्थियों को अपने क्षेत्र के आरटीओ में ही टेस्ट देना होगा।