बूंदी के डबूर गढ़ (डबूसर) गांव में आज भी मूलभूत सुविधाओं का अभाव है। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के संसदीय क्षेत्र और डाबी उप-तहसील का हिस्सा होने के बावजूद, 200 साल से अधिक पुराने इस गांव में पक्की सड़कें नहीं हैं, जिसके कारण 108 एंबुलेंस भी यहां नहीं पहुंच पाती। गर्भवती महिला को चारपाई पर अस्पताल ले जाते हैं ग्रामीण गांव में सड़क न होने का खामियाजा मरीजों और गर्भवती महिलाओं को भुगतना पड़ता है। 108 एंबुलेंस सेवा गांव तक आने से इनकार कर देती है और ऑपरेटर मरीजों को डाबी तक लाने को कहता है। प्रसव पीड़ा होने पर गर्भवती महिलाओं को ग्रामीण चारपाई या कंधों पर लादकर 2 किलोमीटर दूर मुख्य मार्ग तक पहुंचाते हैं। गांव के रास्ते में दो बड़े बरसाती नाले हैं, जिनमें साल भर पानी भरा रहता है। स्कूल जाने वाले बच्चों को इन्हीं नालों को पार करना पड़ता है, जिससे उनकी किताबें अक्सर पानी में बह जाती हैं। राजनीतिक लाभ के लिए गणेशपुरा में किया शामिल ग्रामीणों के अनुसार, इस आदिवासी भील बहुल गांव की सबसे बड़ी समस्या इसकी भौगोलिक स्थिति और राजनीतिक उपेक्षा है। यह गांव 200 साल से अधिक पुराना है और पहले डाबी पंचायत का 'किंगमेकर' माना जाता था, जहां भील समाज के 300 वोट सरपंच का चुनाव तय करते थे। हालांकि, राजनीतिक लाभ लेने के बाद इस गांव को डाबी से काटकर 5 किलोमीटर दूर गणेशपुरा पंचायत में शामिल कर दिया गया। अब ग्रामीण 'त्रिशंकु' स्थिति में हैं, वे वोट देने डाबी जाते हैं और अपने कामों के लिए गणेशपुरा पंचायत पर निर्भर हैं। नेताओं ने शिलान्यास किया, लेकिन नहीं बनी सड़क ग्रामीणों का आरोप है कि पिछले कई सालों में गांव के लिए सड़क कई बार स्वीकृत हुई है। नेताओं ने चुनाव के समय नारियल फोड़कर शिलान्यास भी किया, लेकिन सड़क कभी नहीं बनी। ग्रामीण सवाल उठाते हैं कि अगर सड़क के लिए पैसे आए थे, तो वे किसकी जेब में गए और इसकी जांच होनी चाहिए। 'मोलाट' में विकास, तो 'डबूर' से भेदभाव क्यों? ग्रामीणों ने तुलना करते हुए बताया कि पास ही स्थित मोलाट गांव, जो वन विभाग की पाबंदियों के बीच आता है। वहां सड़क बन रही है, लेकिन डबूर गढ़, जो राजस्व रिकॉर्ड में है, वहां कोई सुनने वाला नहीं है। पिछले विधानसभा चुनाव में ग्रामीणों ने 'वोट बहिष्कार' की चेतावनी दी थी, लेकिन नेताओं के 'झूठे भरोसे' ने उन्हें फिर चुप करा दिया। ग्रामीणों ने उठाई आवाज विकास की आस में बैठी भूरी बाई, सुगना बाई, घिसी बाई, धापू बाई, कैलासी बाई, नारायण भील, मोडू लाल, मांगीलाल, भंवर लाल, भूती लाल, देवराज और रमेश भील ने प्रशासन से आर-पार की लड़ाई का मन बना लिया है।