बारां जिले की अंता तहसील से करीब 20 किलोमीटर दूर सोरसन गांव में ब्रह्माणी माता का अनोखा मंदिर है। स्थानीय मान्यता के अनुसार, करीब 700 साल पुराने इस मंदिर में देवी की मूर्ति के मुख के बजाय पीठ की पूजा की जाती है। गर्भगृह में माता की प्रतिमा का मुख दीवार की ओर है, इसलिए श्रद्धालुओं को पीठ के ही दर्शन होते हैं। यहां पीठ का श्रृंगार कर प्रसाद और भोग चढ़ाया जाता है। इसे 'पीठ पूजन' कहा जाता है। मंदिर में करीब 400 साल से अखंड ज्योत जलने की भी मान्यता है। नवरात्र के दौरान यहां हजारों श्रद्धालु दर्शन करने और मन्नत मांगने पहुंचते हैं। पीठ पूजन की अनोखी परंपरा सोरसन स्थित ब्रह्माणी माता मंदिर की सबसे खास परंपरा यहां होने वाला पीठ पूजन है। गर्भगृह में देवी प्रतिमा का मुख दीवार की तरफ होने के कारण भक्त माता की पीठ के दर्शन करते हैं। पुजारी के मुताबिक, हर दिन माता की पीठ पर सिंदूर लगाया जाता है और कनेर के पत्तों से विशेष श्रृंगार किया जाता है। इसके बाद श्रद्धालु माता को प्रसाद अर्पित करते हैं और पूजा-अर्चना करते हैं। इस अनूठी परंपरा के कारण मंदिर की अलग पहचान है। 400 साल से अखंड ज्योत जलने की मान्यता स्थानीय मान्यता के अनुसार, मंदिर में करीब 400 वर्षों से अखंड ज्योत जल रही है। यहां पूजा-पाठ के दौरान परंपरागत विधि-विधान का पालन किया जाता है। माता की पीठ पर सिंदूर लगाने और कनेर के पत्तों से श्रृंगार करने के बाद दाल-बाटी का भोग लगाया जाता है। श्रद्धालु माता के दर्शन कर सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। खोखर गौड़ ब्राह्मण परिवार से जुड़ी पूजा परंपरा मान्यता है कि ब्रह्माणी माता के प्रकट होने पर खोखर गौड़ ब्राह्मण से प्रसन्न हुई थीं। तभी से उनके वंशज मंदिर में माता की पूजा-अर्चना करते आ रहे हैं। पीढ़ियों से चली आ रही यह परंपरा आज भी मंदिर की धार्मिक पहचान का हिस्सा है। नवरात्र में उमड़ते हैं हजारों श्रद्धालु नवरात्र के दौरान ब्रह्माणी माता मंदिर में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है। इस अवसर पर बड़ा मेला लगता है, जिसमें हजारों भक्त माता के दर्शन करने और मन्नत मांगने पहुंचते हैं। धार्मिक आस्था और पीठ पूजन की अनोखी परंपरा के चलते सोरसन का यह मंदिर क्षेत्र के प्रमुख आस्था स्थलों में शामिल है।