सीजेआई सूर्यकांत ने कहा-समझौते या मिडिएशन के जरिए आपसी विवाद सुलझाना हमारे सत्यता की जड़ों में है। महात्मा गांधी ने भी अपने वकालत जीवन का सबसे संतोषजनक अनुभव दो पक्षों के बीच आपसी समझौते में मददगार बनने को बताया था। मिडिएशन कानून बनने से पहले भी मिडिएशन हमारी रगों में दौड़ता रहा है। सीजेआई ने ये बातें जयपुर में कॉमनवेल्थ देशों के मिडिएशन सेमिनार के दूसरे दिन के सेशन में कही। कहानी से समझाया विवाद निपटाने का महत्व सीजेआई सूर्यकांत ने दो बहनों के बीच संतरे की लड़ाई की कहानी के जरिए आपसी समझौते से विवाद निपटाने का महत्व बताया। जस्टिस ने कहा- दो बहनें एक संतरे के लिए आपस में लड़ रही थीं। दोनों ही खुद को उस संतरे का असली हकदार बता रही थीं। दोनों अपनी-अपनी बात पर अड़ी हुई थीं। बड़ी बहन खुद के उम्र में बड़ी होने का तर्क देते हुए खुद को संतरे का असली हकदार बता रही थी। छोटी बहन का तर्क था कि वो छोटी है, इसलिए संतरे की ज्यादा हकदार है। काफी देर तक बहस चलती रही, लेकिन कोई नतीजा नहीं निकल रहा था। क्योंकि दोनों जिद पर अड़ी थी। लंबी बहस के बाद समाझौते करना पड़ा सीजेआई ने कहा- लंबी बहस के बाद भी समाधान नहीं निकलने पर दोनों ने आखिरकार समझौता करने का फैसला किया। संतरे को बीच से आधा-आधा काट दिया। दोनों बहनें आधा-आधा संतरा लेकर चली गईं। आधा संतरा हाथ में आने के बाद पहली बहन ने उसे छीला और छिलका फेंक दिया, अंदर का फल खा लिया। दूसरी बहन ने अपने हिस्से के आधे संतरे को छीलकर अंदर का फल फेंक दिया और उसके छिलके से केक बनाया। सीजेआई ने कहा- इन दोनों बहनों ने जिद छोड़ एक दूसरे की जरूरत को समझा होता और आपस में बातचीत की होती तो दोनों को बिल्कुल वही मिलता जो वे चाहती थीं। जिस बहन को फल खाना था, उसे आधा नहीं बल्कि पूरा संतरा खाने को मिलता। जिस बहन को केक बनाना था, उसे पूरे संतरे का छिलका मिल जाता। असली जिंदगी में भी मिडिएशन के बिना इसी तरह बातचीत अधूरी रह जाती है। मध्यस्थता वेदों और भारतीय इतिहास में मौजूद सीजेआई ने कहा- कल उद्घाटन सत्र में यह बहुत ही सही तरीके से बताया था कि मध्यस्थता जो वेदों में और भारत के इतिहास में मौजूद है। रामायण, महाभारत और हमारी पुरानी ऐतिहासिक कहानियां हैं। हर कहानी मध्यस्थता का एक नया आयाम बताती है, जिसे मुझे दोहराने की आवश्यकता नहीं है। कल उद्घाटन भाषण में इस पर बहुत सोच-समझकर विचार किया गया था। कौटिल्य ने कानून के राज के लिए साम, दांड, दंड और भेद ये चार तरीके बताए थे सीजेआई ने कहा- कौटिल्य के अर्थशास्त्र का ही उदाहरण लीजिए, कौटिल्य ने कानून के शासन के लिए चार तौर-तरीके बताए थे। कौटिल्य के चार तरीके साम, दाम, दंड और भेद के नाम से जाने जाते है। कौटिलय ने तय किया कि राजा का अंतिम फैसला चौथा यानी दंड है, तो साम क्या है? साम का अर्थ है समझाना-बुझाना। दाम का अर्थ है प्रोत्साहन या कीमत। दंड का अर्थ है सजा या बल का प्रयोग और भेद का अर्थ है विभाजन या फायदा उठाना। यह राजा के लिए नियम था। राजा के लिए फूट डालो और राज करो का नियम था। कौटिल्य ने साम यानी सुलह को सबसे अच्छा विकल्प बताया था सीजेआई ने कहा- कौटिल्य मेरे द्वारा पढ़े गए इतिहास में सबसे महान दार्शनिकों में से एक हैं। कौटिल्य जो पहला विकल्प देते हैं, वह साम है, मतलब समझाना-बुझाना या सुलह। तो मूल रूप से मध्यस्थता का सिद्धांत उसी दर्शन से आया है। उसी दर्शन ने वास्तव में शासन के संहिताबद्ध सिद्धांतों को तैयार करने का रास्ता साफ किया। राजा का फैसला अंतिम होता था, लेकिन पहला विकल्प समझौता ही था सीजेआई ने कहा- कौटिल्य के सैकड़ों साल बाद एक और दर्शन आया जिसने न्यायिक फैसलों के लिए पदानुक्रम तय किया। इस पदानुक्रम में पहले कुल, फिर श्रेणी, इसके बाद पूग (समूह) और आखिर में खुद राजा का फैसला था। यहां भी चार सिद्धांत थे। पहला सिद्धांत फिर से एक साथ बैठने और अपने विवादों को आपस में सुलझाने की बात करता है। महात्मा गांधी ने आपसी समझौते को संतोषजनक अनुभव बताया था सीजेआई ने कहा- हम सभी ने महात्मा गांधी के बारे में पढ़ा है। गांधीजी वकालत में बिताए अपने दिनों को याद करते हुए यह स्वीकार करते हैं कि एक वकील के रूप में उनका सबसे संतोषजनक अनुभव तब था जब उन्होंने दो पक्षों के बीच मध्यस्थता कराई। दो पक्षों के बीच सौहार्दपूर्ण समझौते में योगदान दिया। इससे हमें जो समझ मिलती है, वह यह है कि मध्यस्थता भारत में 2023 में एक कानून का रूप आने से पहले ही हमारे रगों में दौड़ रही है। यह हमारी संस्कृति का एक हिस्सा है। अब न केवल यह हमारी संस्कृति का एक हिस्सा है, बल्कि अब विधायिका और ज्यूडिशरी ने भी इसमें अहम भूमिका निभाई है। ये भी पढ़ें… सीजेआई बोले-विवाद सुलझाने के लिए बोलने से ज्यादा सुनना पड़ता:दो पड़ोसियों-दो देशों का छोटा हो या बड़ा मामला, तरीका एक जैसा जयपुर में चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (सीजेआई) सूर्यकांत ने कहा- जयपुर शहर को सामाजिक सौहार्द के सिद्धांत पर बसाया गया है। इसलिए मुझे लगता है कि इस कॉन्फ्रेंस के लिए इससे बेहतर जगह नहीं हो सकती है। मध्यस्थता ये बताती है कि कोई भी एक आवाज किसी दूसरी आवाज को दबा ना पाए। (पूरी खबर पढ़ें)