सोलर सिस्टम( सौर मंडल) में उठने वाले खतरनाक सौर तूफानों से अब अंतरिक्ष में घूम रहे भारत के सैटेलाइट (उपग्रह) खराब नहीं होंगे। भारत ने अपने करोड़ों रुपए के सैटेलाइट्स को सुरक्षित रखने के लिए एक नया 'दिशा' (DISHA) मिशन शुरू किया है। यह जुड़वां सैटेलाइट मिशन सूरज से धरती की तरफ आने वाले तूफानों का समय से पहले ही अलर्ट दे देगा। इससे खतरे के वक्त सैटेलाइट को कुछ देर के लिए स्विच ऑफ (बंद) करके सुरक्षित कर लिया जाएगा और वे जलने या खराब होने से बच जाएंगे। उदयपुर की फतहसागर झील के बीच बनी सौर वेधशाला (यूएसओ) में चल रही तीन दिवसीय राष्ट्रीय सौर भौतिकी बैठक में देश के बड़े वैज्ञानिकों ने यह नई जानकारी साझा की। 28 से 30 अक्टूबर तक चलने वाली इस बैठक में देश के 22 बड़े संस्थानों से 75 वैज्ञानिक और शोधकर्ता उदयपुर में आए हुए हैं। सूरज का तूफान कैसे पहुंचाता है नुकसान और 'दिशा' कैसे बचाएगा अंतरिक्ष विभाग की भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला (पीआरएल) के डीन प्रो. डी. पल्लम राजू ने बताया कि जब सूरज में चुंबकीय (जियोमैग्नेटिक) तूफान उठते हैं, तो बहुत बड़ी मात्रा में इलेक्ट्रॉन काफी तेज रफ्तार से धरती की तरफ बढ़ते हैं। इससे अंतरिक्ष के ऊपरी हिस्से (आयन मंडल) में भारी हलचल मच जाती है। इस हलचल से धरती के चारों तरफ चक्कर लगा रहे सैटेलाइट के सिस्टम फेल हो सकते हैं, जिससे मोबाइल नेटवर्क, टीवी प्रसारण, जीपीएस और मौसम की जानकारी देने वाली सेवाएं ठप होने का खतरा रहता है। प्रो. राजू ने बताया कि इसी खतरे से निपटने के लिए 'दिशा' (डिस्टर्ब्ड एंड क्वाइट टाइम आयनोस्फीयर-थर्मोस्फीयर सिस्टम एट हाई एल्टीट्यूड) मिशन तैयार किया जा रहा है। यह सोलर रिसर्च और स्पेस रिसर्च का संगम है, जिसके तहत तीन खास उपकरण बनाए जा रहे हैं। यह मिशन पृथ्वी के ऊपरी वायुमंडल में रहकर सौर तूफानों की सटीक जानकारी पहले ही दे देगा। ठीक वैसे ही जैसे बिजली गिरने या वोल्टेज बढ़ने पर हम घर के उपकरण बंद कर देते हैं, उसी तरह अंतरिक्ष में सैटेलाइट को भी तूफान गुजरने तक कुछ देर बंद रखकर बचा लिया जाएगा। 2035 तक अंतरिक्ष में होगा भारत का अपना स्पेस स्टेशन बैठक में प्रो. पल्लम राजू ने बताया कि अंतरिक्ष के मौसम को समझने के मामले में भारत दुनिया के अग्रणी देशों में शामिल हो रहा है। इसरो (ISRO) की योजना के मुताबिक साल 2035 तक अंतरिक्ष में भारत का अपना खुद का 'भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन' स्थापित कर लिया जाएगा। इसके अलावा आने वाला अगला चंद्रयान मिशन भी अंतरिक्ष की दुनिया में भारत की एक और बड़ी छलांग साबित होगा। भाषण नहीं, सीधी बातचीत से निकल रहे नए आइडिया; आदित्य-L1 पर भी चर्चा पीआरएल के निदेशक प्रो. अनिल भारद्वाज ने बताया कि इस बार बैठक का तरीका बदला गया है। पहले ऐसी बैठकों में सिर्फ लंबे भाषण होते थे, लेकिन अब वैज्ञानिकों की आपसी बातचीत और सवाल-जवाब को मुख्य जगह दी गई है। वेधशाला प्रमुख प्रो. शिबु के. मैथ्यू और आयोजन अध्यक्ष प्रो. भुवन जोशी के अनुसार बैठक में पांच अलग-अलग सत्रों में कुल 60 रिसर्च पेपर (30 मौखिक और 30 पोस्टर) पेश किए जा रहे हैं। इनमें भारत के पहले सूर्य मिशन 'आदित्य-L1' से मिली ताजा जानकारियों, सूरज की एक्स-रे किरणों, सौर वायुमंडल की हलचल और अंतरिक्ष के बदलते मौसम पर गहराई से मंथन हो रहा है। आखिर उदयपुर की झील के बीच ही क्यों बनी यह वेधशाला? वेधशाला के पूर्व वरिष्ठ वैज्ञानिक प्रो. अशोक अम्बस्था ने बताया कि उदयपुर की सौर वेधशाला ने अपने 51 साल पूरे कर लिए हैं। साल 1975 में प्रसिद्ध वैज्ञानिक स्वर्गीय प्रो. अरविंद भटनागर के प्रयासों से इसकी शुरुआत हुई थी। इसे उदयपुर की फतहसागर झील के बीच बनाने के पीछे दो बड़े वैज्ञानिक कारण थे। अम्बस्था ने बताया कि पहला तो यह कि उदयपुर में साल में सबसे ज्यादा दिन आसमान साफ रहता है, जिससे सूरज पर लंबे समय तक बिना रुकावट नजर रखी जा सकती है। दूसरा बड़ा कारण झील का पानी है। जमीन की तपन से हवा में जो गर्म तरंगें उठती हैं, वे दूरबीन से सूरज की साफ फोटो लेने में रुकावट डालती हैं। लेकिन चारों तरफ झील का ठंडा पानी होने से ये तरंगें शांत रहती हैं और सूरज की बेहद साफ तस्वीरें मिलती हैं। दस साल पहले यहां देश की सबसे आधुनिक और बड़ी सौर दूरबीन 'मास्ट' (MAST) लगाई गई थी, जो आज भी सूरज के रहस्यों से पर्दा उठा रही है।