चिकित्सा विभाग के एक आदेश ने सरकारी मेडिकल कॉलेजों के डॉक्टरों में विवाद खड़ा कर दिया है। आदेश के अनुसार आरयूएचएस में आचार्य और सहआचार्य पदों के लिए 6 राजकीय मेडिकल कॉलेजों के चिकित्सक शिक्षकों के साथ चिकित्सा विभाग के विषय विशेषज्ञ चिकित्सा अधिकारियों यानी प्रिंसिपल स्पेशियलिस्ट व सीनियर स्पेशियलिस्ट पर भी विचार होगा। इसके लिए तीन सदस्यीय स्क्रीनिंग कमेटी बनाई गई है। राजस्थान मेडिकल कॉलेज टीचर्स एसोसिएशन ने मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा को पत्र लिखकर आदेश निरस्त करने की मांग की है। एसोसिएशन का आरोप है कि सरकार एमओ कैडर के डॉक्टरों को सीधे आचार्य-सहआचार्य जैसे टीचिंग पदों पर लाने की तैयारी कर रही है। उनका सवाल है कि जब मेडिकल कॉलेजों में शिक्षक कैडर अलग है तो एमओ कैडर को फैकल्टी पदों पर पैराशूट एंट्री क्यों दी जा रही है? विवाद का दूसरा बड़ा कारण आदेश की अस्पष्टता है। आदेश में यह साफ नहीं है कि डॉक्टरों को डेपुटेशन पर लगाया जाएगा या उन्हें आचार्य-सहआचार्य पदों पर नियुक्त किया जाएगा। एसोसिएशन का कहना है कि यदि मंशा लेटरल एंट्री की नहीं है तो स्क्रीनिंग कमेटी भंग कर संशोधित आदेश जारी किया जाए, ताकि पात्र डॉक्टरों को समान अवसर मिल सके। विशेषज्ञों का कहना है कि एक तरफ एम्स की तर्ज पर रिम्स बनाकर टीचिंग और रिसर्च बढ़ाने की बात हो रही है, दूसरी ओर फैकल्टी चयन की प्रक्रिया स्पष्ट नहीं है। यदि रिम्स के लिए अलग भर्ती होनी है तो अभी इस आदेश का औचित्य भी सवालों में है। स्क्रीनिंग कमेटी भंग कर संशोधित आदेश निकाले कमेटी रिम्स के लिए बनाई गई है। नियम-कायदे देखे जा रहे हैं। इन्हीं के आधार पर डेपुटेशन या अन्य प्रक्रिया तय होगी। - बीएल गोयल, आयुक्त, चिकित्सा शिक्षा विभाग यदि चिकित्सा अधिकारियों को लेटरल एंट्री से सीधे आचार्य-सहआचार्य बनाने की मंशा नहीं है तो स्क्रीनिंग कमेटी भंग कर संशोधित आदेश निकाला जाए। पूर्व में भी ग्रुप-2 अधिकारियों को सीधे प्रोफेसर बनाने के प्रयास हुए थे। - डॉ. धीरज जैफ, अध्यक्ष, राजस्थान मेडिकल कॉलेज टीचर्स एसोसिएशन