भीलवाड़ा | शांतिभवन में चातुर्मास के दौरान श्रमणसंघीय युवाचार्य महेन्द्र ऋषिजी ने उत्तराध्ययन सूत्र के सातवें, आठवें और नवें अध्यायों पर स्वाध्याय-प्रवचन किया। उन्होंने कहा कि लाभ का आनंद लिया जा सकता है, लेकिन जब वह लोभ बनता है तो व्यक्ति शांति, समय और पुण्य खो देता है। उन्होंने जिनवाणी को केवल सुनने के बजाय जीवन में उतारने पर जोर दिया। सातवें अध्याय के बकरे के दृष्टांत के जरिए उन्होंने कहा कि दिखने वाला सुख हमेशा कल्याण का संकेत नहीं होता। आठवें कापिलीय अध्याय के प्रसंग में उन्होंने सच बोलने और अपनी भूल स्वीकारने को सुधार की पहली सीढ़ी बताया। नवें नमि पवज्जा अध्याय में उन्होंने राजा नमि के वैराग्य का उल्लेख करते हुए कहा कि आत्मसंयम ही वास्तविक विजय है। संस्था अध्यक्ष राजेंद्र प्रसाद चीपड़ के अनुसार महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, गुजरात और तमिलनाडु सहित कई राज्यों से श्रद्धालु कार्यक्रम में पहुंचे।