फलोदी में रविवार को बड़ी धर्मशाला में आचार्य तत्वदर्शन सुरेश्वर महाराज ने 'मनुष्य भव की सार्थकता' विषय पर प्रवचन दिया। उन्होंने कहा कि मनुष्य जीवन अत्यंत दुर्लभ है और यह केवल सांसारिक सुखों के उपभोग के लिए नहीं, बल्कि आत्मकल्याण तथा आध्यात्मिक उन्नति के लिए प्राप्त हुआ है। वर्तमान पर ध्यान केंद्रित करने की सलाह दी आचार्यश्री ने बताया कि वर्तमान में अधिकांश लोग 'व्हाट नेक्स्ट' की चिंता और तनाव में जी रहे हैं। वे परलोक को लेकर भी अनेक शंकाओं से घिरे रहते हैं। उन्होंने भविष्य की चिंता करने के बजाय वर्तमान में क्या करना है, इस पर ध्यान केंद्रित करने की सलाह दी। तप का महत्व बताया उन्होंने जोर दिया कि मनुष्य भव एक श्रेष्ठ गति है, जिसमें साधना के बल पर शीघ्र आध्यात्मिक उन्नति की जा सकती है। हालांकि, जरा सी लापरवाही पतन का कारण भी बन सकती है। आचार्यश्री ने तप का महत्व समझाते हुए कहा कि तप का अर्थ स्वयं को तपाकर शुद्ध करना है, जबकि साधना के माध्यम से संचित कर्मों का क्षय करना ही वास्तविक आध्यात्मिक प्रगति है। आचार्यश्री ने एक उदाहरण देते हुए कहा कि जिस प्रकार नमक के बिना भोजन स्वादहीन रहता है, उसी प्रकार भाव के बिना धर्म, पूजा और ध्यान भी निष्फल हो जाते हैं। प्रवचन के अंत में उन्होंने उपस्थित श्रद्धालुओं से प्रतिदिन साधना करने का संकल्प करवाया। ये रहे मौजूद इस अवसर पर जैन सकल श्रीसंघ की ओर से हंसरत्न सुरेश्वर, विजय तत्वदर्शन सूरिश्वर एवं धर्मध्यानरत्न महाराज को कामली ओढ़ाकर सम्मानित किया गया। कार्यक्रम में संघ अध्यक्ष घीसूलाल गोलछा, सचिव महिपाल कोठारी, देवेंद्र गोलछा, सुभाष कानूगा, अशोक कोचर, मुकेश कोठारी, हर्ष कोठारी, जितेंद्र बछावत, कुंदन लुणावत, रोहित गोलछा, मिलापचंद लूकड़ और रमेश गोलछा सहित अनेक श्रद्धालु उपस्थित रहे। संघ अध्यक्ष घीसूलाल गोलछा ने आभार व्यक्त किया।