15 साल पहले ड्यूटी के दौरान जान गंवाने वाले कमांडो को आज तक शहीद का दर्जा नहीं मिल पाया है, जिससे परिवार का दर्द बढ़ता जा रहा है। गैंगस्टर भानूप्रताप हत्याकांड में पुलिस वैन पर हुए हमले के दौरान अपनी जान गंवाने वाले इस बहादुर जवान को न तो सम्मान मिला और न ही वादों के अनुरूप कोई ठोस कदम उठाए गए। शहीद की मां का कहना है कि इतने वर्षों में उन्हें सिर्फ आश्वासन ही मिले- न बेटे के नाम पर स्कूल बना और न ही उसे वह सम्मान मिला, जिसका वह हकदार था। दरअसल, राजस्थान के गैंगस्टर भानूप्रताप सिंह की पुलिस वैन को गोलियों से छलनी के करने के ​चर्चित हत्याकांड को आज 15 साल पूरे हो गए है। माता-पिता और पत्नी आज भी उस दिन को याद कर डर जाते हैं। यह कहानी उदयपुर के बेदला गांव में रहने वाले राजस्थान पुलिस के कमांडो प्रकाश खटीक के परिवार की है। एक दर्जन से ज्यादा बदमाशों ने घेरकर की थी फायरिंग 19 अप्रैल 2011 को उसे उदयपुर जेल में बंद कुख्यात गैंगस्टर भानूप्रताप सिंह को झालावाड़ कोर्ट पेश करने जा रही पुलिस वैन के साथ भेजा गया। वो अपने 1 अधिकारी और 4 साथी जवानों के साथ वैन में था। रात करीब 12:30 बजे भीलवाड़ा जिले के बिजोलिया क्षेत्र में अचानक एक दर्जन से ज्यादा बदमाशों ने पुलिस वैन पर हमला कर दिया। एक के बाद लगातार 40 गोलियां चलीं। यह हमला गैंगस्टर भानूप्रताप पर शिवराज गैंग के बदमाशों ने किया था। वैन में गैंगस्टर भानूप्रताप सिंह को 4 गोलियां लगी। उसके कमांडो प्रकाश खटीक और सोहनलाल को भी 4-4 गोलियां लगी। गैंगस्टर भानू और कमांडो प्रकाश ने मौके पर दम तोड़ दिया। जबकि अस्पताल में ले जाते समय प्रकाश के साथी कमांडो सोहनलाल की भी मौत हो गई थी। सरकार ने अनाउंस किया था 20 लाख का पैकेज राजस्थान के इस बहुचर्चित हत्याकांड को आज 15 साल पूरे हो गए हैं। तत्कालीन राज्य सरकार ने प्रकाश के परिवार को 20 लाख रुपए का पैकैज दिया था। शहीद का दर्जा देने के लिए फाइल भी चलाई, मगर वो आगे नहीं बढ़ सकी। न उस गांव के स्कूल का नामकरण प्रकाश के नाम पर हो पाया है, न सिर्फ चौराहे पर उसकी मूर्ति लग पाई है। अधिकारी-मंत्रियों का आश्वासन कागजों में रहा कमांड़ो प्रकाश की पत्नी सुनीता ने बताया कि 19 अप्रैल का वो दिन हमारी जिंदगी का काला दिन था। हमारी जिंदगी खत्म कर दी। उनके पति की मौत के बाद पुलिस अधिकारियों से लेकर मंत्री तक आए। सबने प्रकाश को शहीद का दर्जा देकर मदद का पूरा आश्चासन दिया। हालांकि, आर्थिक मुआवजा मिला। मगर कुछ दिन के बाद ये आश्वासन सिर्फ कागजों में रह गए। एक विभाग से दूसरे विभाग तक यह फाइल घूम रही है। पति ने सरकार के जिस सिस्टम में ड्यूटी निभाते हुए जान गंवा दी, वही आज कोई सुनवाई नहीं हो रही है। अनुकंपा नियुक्ति के लिए चल रही फाइल सुनीता ने बताया कि पति की मौत के वक्त बेटा-बेटी छोटे थे। उन्हें अपने पिता की शक्ल तक​ भी याद नहीं है। बेटा अब बालिग हो गया है। अनुकंपा नियुक्ति के लिए भी कई जगह फाइल चल रही है, पर जवाब कहीं से नहीं आ रहा। सुनीता ने कहा कि सरकार जल्द उन्हें शहीद का दर्जा दे और स्कूल का नामकरण करने के बाद चौराहे पर मूर्ति भी लगवाए। बेटे के सिर पर हाथ फेरने से लेकर सब रस्में करवाई प्रकाश की मां कमला देवी ने बताया कि 19 अप्रैल के उस दिन फोन पर समाचार मिला। दूसरे दिन दोपहर तक मुझे किसी ने कुछ नहीं बताया। जब बाद में पता लगा मैं बेहोश हो गई थी। बेटे के सिर पर हाथ फेरने से लेकर सब रस्में करवाई, मगर मुझे भी ध्यान नहीं था। कमला ने बताया कि इस हत्याकांड के बाद पति ओकारलाल डिप्रेशन में चले गए। वे प्रकाश की मौत के बाद अकेले में माता के मंदिर में रोते रहते थे। इनको अपने बेटे की बहुत याद आती थी। बेटे की मौत के करीब 9 महीने के बाद पैरालिसिस का अटैक आ गया। …. ये खबर भी पढ़िए… दोनों हाथ कटने के बाद भी डकैतों का सामना किया:बैंक लुटने से बचाने वाले राजस्थान के जांबाज जवान को 44 साल बाद मिला सम्मान बांसवाड़ा की जगपुरा चौकी प्रभारी करण सिंह (49) की आंखें भर आईं। वे उन जांबाज कॉन्स्टेबल मानसिंह के छोटे बेटे हैं, जिनकी बहादुरी की कहानी 44 साल बाद जनता के सामने आई है। पूरी खबर पढ़िए…