अलवर जिले की कठूमर तहसील के गांव रौनीजाथान के रहने वाले विक्रमसिंह गुर्जर ने सात बीघा जमीन पर गौ आधारित प्राकृतिक खेती, सब्जी, फल उत्पादन और डेयरी का मॉडल अपनाकर आमदनी बढ़ाई है। वे केवल खेती पर ​निर्भर नहीं रहते। डेयरी, बागवानी से भी कमा रहे हैं। एक बीघा में लगाई गई नेपियर घास से उन्होंने न केवल कृषि लागत घटाई बल्कि पशुपालन को भी लाभकारी बना दिया। विक्रम का मानना है कि रासायनिक खाद के बढ़ते उपयोग से न केवल अनाज में पोषक तत्वों की कमी हो रही है, बल्कि उत्पादन लागत भी बढ़ रही है। जमीन को बंजर होने से बचाने के लिए वे दूसरे किसानों को भी जैविक खेती अपनाने में सहयोग कर रहे हैं। वे बताते हैं कि फसल की लागत घटाने में पशुपालन का बड़ा सहयोग रहा। उन्होंने सुपर नेपियर- ताइवान ज्वाइंट किंग ग्रास प्रजाति का चारा अपने फार्म पर लगाया। यह बारहमासी चारा है, जो एक बार लगाने के बाद 8 से 10 वर्षों तक हरा रहता है। हर 45-50 दिन में और वर्ष में 5 से 6 बार हरा चारा आसानी से मिल जाता है। इस घास को बाकी हरे चारे की तुलना में पानी की आवश्यकता भी कम होती है। अच्छा प्रोटीन और पौष्टिक तत्वों से भरपूर होने के कारण न केवल दूध उत्पादन और फैट बढ़ने लगी, बल्कि पशुओं में बांझपन की समस्या भी समाप्त हो गई। इस चारे के नियमित उपयोग से पशुओं को दिए जाने वाले सूखे चारे, अनाज, खल, बाट और दलिया आदि का खर्च घटकर आधा रह गया है। अब वे किसी भी किसान को अपने फार्म से सुपर नेपियर घास की गांठे बुआई के लि निशुल्क उपलब्ध करा रहे हैं। विक्रमसिंह ने पारंपरिक फसलों के साथ-साथ अपने खेत में अनार, पपीता, आंवला और अमरूद के करीब 14-15 पेड़ लगाए हैं। इसके साथ ही वे साल भर अपने घरेलू उपयोग के लिए पूरी तरह से जैविक सब्जियां उगा रहे हैं। वे बताते हैं कि इससे भी वे हर महीने 3000 से 4000 रुपए का खर्च बचा रहे हैं। खेती और पशुपालन से घर बैठे वे तीन लाख रुपए की आय ले रहे हैं। इसके अलावा एक बीघा हरे चारे के उत्पादन से एक लाख रुपए तक की अतिरिक्त आमदनी हो रही है।