जयपुर के किशनगढ़ रेनवाल ब्लॉक का खेड़ी मिलक गांव भूजल के डार्क जोन में है। यहां पानी की कमी है, या फिर खारा है। इस गांव के युवा किसान कानाराम यादव बरसाती खेती पर ही निर्भर रहे। वे अपनी आठ बीघा जमीन पर बाजरा की फसल से ज्यादा कभी कुछ दूसरी फसल ले नहीं पाते थे। इंटरनेट और यूट्यूब के जरिए सरकारी योजनाओं और कम पानी में होने वाली फसलों का पता लगाया। फार्म पौंड में सालभर के लिए पानी फिर वर्ष 2024 में खेत में पॉलीहाउस लगाया। बारिश में पॉलीहाउस की छत का पानी एकत्र करने के लिए दो फार्म पौंड बना लिए। सिंचाई के लिए पांच एचपी का सोलर पंप भी लगाया है। अब इन दो फार्म पौंड में इतना पानी जमा हो जाता है कि साल भर चार हजार वर्गमीटर क्षेत्र में खीरे और बाकी जमीन पर गेहूं, बाजरा व टमाटर की फसल हो जाती है। खीरे की जैविक खेती कभी उनकी पूरे साल में एक लाख की फसल नहीं हो पाती थी लेकिन इन दिनों वे रोज बीस से पच्चीस हजार रुपए कमा रहे हैं। कानाराम खीरे की खेती भी जैविक ही कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि इससे तीस प्रतिशत तक खर्च घट जाता है। जैविक खीरे के भाव भी अच्छे मिलते हैं। यह दो सप्ताह तक खराब भी नहीं होता। रासायनिक खेती वाला खीरा दो तीन दिन में ही सड़ने लग जाता है। गेंदे की पौध से पहचान रहे रोग वे फसल में रोग की पहचान पहले से ही कर लेते हैं। ताकि नियंत्रण आसानी से किया जा सके। इसके लिए भी वैज्ञानिक तरीका अपनाया है। कानाराम ने बताया कि खीरे की फसल के चारों ओर पॉलीहाउस में गेंदे की पौध लगा देते हैं। गेंदा रोग के मामले में संवेदनशील होता है। कोई भी कीट व रोग का प्रकोप होगा तो इसकी पौध मुरझा जाएगी। इन पौधों में रोग के लक्षण दिखते ही उपचार कर देते हैं। इससे रोग फैलता नहीं और गेंदे के फूल भी आय देते हैं। खुद तैयार करते हैं ऑर्गेनिक खाद कानाराम खुद ऑर्गेनिक खाद तैयार करते हैं। 20 पशु पाल रखे हैं। दूध घी से भी अतिरिक्त आय हो रही है। गोबर से केंचुआ खाद और नीम, गुड़, चूना, बेसन और छाछ सहित अन्य घरेलू नुस्खों से जैविक कीटनाशक तैयार कर रहे हैं। इस खाद से फसल को प्राकृतिक पोषण मिलता है। मिट्टी की गुणवत्ता भी बढ़ाती है। ऑर्गेनिक खाद पौधों को अधिक मजबूती देकर सिंचाई की जरूरत भी कम कर देती है। उन्होंने इन तरीकों से खेती को लाभदायक बना दिया है।