जवाई कंजर्वेटिव क्षेत्र का इको सिस्टम बचाने के लिए हाईकोर्ट के आदेश पर बनी सिस्टम के 4 बड़े हथियार हैं। अब सभी सफारी वाहनों में जीपीएस अनिवार्य है। इसकी निगरानी के लिए बाहरी एजेंसी को नियुक्त किया जाएगा, ताकि डेटा में कोई छेड़छाड़ न हो सके। बेहतर मॉनिटरिंग के लिए पूरे क्षेत्र को 4 हिस्सों में बांटा गया है। क्लस्टर ए में बीसलपुर, पेरवा, बलवाना, क्लस्टर-बी में सेना, जीवड़ा, क्लस्टर-सी में दूदनी, रघुनाथपुरा, मोरी। क्लस्टर-डी में कोठार, वेलार, वरावल (सबसे संवेदनशील इलाका) शामिल किया गया है। कलेक्टर की अध्यक्षता में जवाई सफारी एंड इको-टूरिज्म को ऑर्डिनेशन कमेटी का गठन किया गया है, जो सीधे तौर पर नियमों को लागू करवाएगी। अब वन्यजीव संरक्षण अधिनियम की धारा 9 के तहत नाइट सफारी करना, बैटिंग (मांस डालना ),चारा डालना, ड्रोन उड़ाना और जीपीएस से छेड़छाड़ करना गंभीर उल्लंघन माना जाएगा। ऐसा करने पर गाड़ी को तुरंत रोका जा सकता है, उसे ब्लैकलिस्ट किया जा सकता है और जहां वाइल्डलाइफ प्रोटेक्शन एक्ट लागू नहीं होता, वहां 25 हजार रुपए का जुर्माना लगेगा। एसओपी की आधिकारिक अधिसूचना जारी होने के बाद 60 दिन का एक ट्रांजिशन पीरियड दिया जाएगा। इस दौरान सभी सफारी गाड़ियों का रजिस्ट्रेशन किया जाएगा, जीपीएस लगाए जाएंगे और ड्राइवर-रिसॉर्ट्स से लिखित शपथ पत्र लिए जाएंगे। 60 दिन बाद समझाइश का दौर खत्म होगा और तीन चरणों में पूरी एसओपी लागू हो जाएगी। एसओपी डीसीएफ पाली कस्तूरी प्रशांत सुले, एसीएफ साहिल पोसवाल ने तैयार की है। इसमें सीसीएफ जोधपुर अनूप केआर की भूमिका भी बहुत महत्वपूर्ण रही। नक्शे में जंगल नहीं, इसलिए मिलती रही मंजूरी; जमीन पर गुफाएं थीं, इसलिए पैंथर भाग गए जवाई की अधिकांश पहाड़ियां सरकारी रिकॉर्ड में राजस्व भूमि दर्ज हैं। यही वो लूपहोल है, जिसने पूरा खेल बदल दिया। वन विभाग केवल फॉरेस्ट बाउंड्री देखता रहा। नक्शे पर जहां जंगल नहीं, वहां खतरा भी नहीं माना गया और इसी आधार पर ‘मैकेनिकल एनओसी’ जारी होती रही। जमीन पर क्या है? लेपर्ड की गुफा, ब्रीडिंग साइट या कॉरिडोर, यह जांच का हिस्सा ही नहीं था। बाली क्षेत्र के कोठार गांव में यह विरोधाभास साफ दिखता है। एक खसरा पर रिसॉर्ट का निर्माण हुआ। ठीक नीचे पहाड़ी, जहां लेपर्ड की सक्रिय गुफाएं हैं। याचिका के अनुसार यहां 4-5 शावकों के साथ लेपर्ड रह रहे थे। निर्माण शुरू हुआ। आवाजाही बढ़ी और अब डेन अबंडनमेंट (मांद छोड़ना) के संकेत मिल रहे हैं। स्थानीय गाइड बताते हैं कि पहले यहां रोज साइटिंग होती थी। जवाई में पर्यटन धीरे-धीरे इको-टूरिज्म से शो-टूरिज्म में बदल गया। सीजन में 300 से ज्यादा जिप्सियां, लेपर्ड को पास लाने के लिए मांस डालना (बैटिंग), रात में फ्लैशलाइट के साथ नाइट सफारी, गुफाओं के बाहर भीड़ और शोर होता रहा। 4 क्लस्टर में बांटा पूरा क्षेत्र, रिसॉर्ट मालिक भी होंगे जिम्मेदार, 60 दिन में रजिस्ट्रेशन अनिवार्य