जोधपुर डिस्कॉम के संभावित निजीकरण के विरोध में कर्मचारियों ने रैली निकाली। जोधपुर डिस्कॉम संयुक्त संघर्ष समिति के बैनर तले गुरुवार को कर्मचारी रैली के रूप में कलेक्ट्रेट पहुंचे और वहां नारेबाजी की। इसके बाद मुख्यमंत्री के नाम एडीएम को अपनी मांगों को लेकर ज्ञापन सौंपा। समिति के संयोजक उम्मेदाराम चौधरी ने बताया- डिस्कॉम के निजीकरण के प्रस्तावित प्रक्रिया से कर्मचारी-अधिकारियों के साथ-साथ उपभोक्ताओं को भी नुकसान होगा। उन्होंने कहा कि राजस्थान में फ्रेंचाइजी मॉडल के रूप में इससे पहले निजी कंपनी को कोटा, बीकानेर और भरतपुर में अवसर दिया गया। जहां निजी कंपनियों ने समझौते की शर्तों का उल्लंघन किया। उन्होंने बताया- इन कंपनियों ने सरकारी बुनियादी ढांचे और भवनों का पूरा लाभ उठाने के बाद 33% स्टाफ वापस डिस्कॉम पर थोप दिया। साथ ही उपभोक्ताओं को गुणवत्तापूर्ण सेवा देने की बजाय केवल राजस्व वसूली पर ध्यान दिया। इससे स्थानीय रोजगार कम हुआ और ठेका कर्मचारियों का शोषण बढ़ा। इसे देखते हुए सीख लेने की जरूरत है। दोषपूर्ण नीतिगत निर्णय से बढ़ा घाटा उम्मेदाराम चौधरी ने बताया- जोधपुर डिस्कॉम का वित्तीय घाटा दोषपूर्ण नीतिगत निर्णय, अत्यधिक आउटसोर्सिंग और अनावश्यक ठेका प्रथा परिणाम है, न की कर्मचारियों की अकर्मण्यता का। इसके विपरीत कर्मचारियों ने निष्ठा और परिश्रम से एटी एंड सी लॉस को 34% से घटकर 22% पर लाकर दिखाया है। ओडिशा में विफल हो चुका यह मॉडल समिति के जगदीश दाधीच ने बताया- ऐसा मॉडल ओडिशा में विफल हो चुका है। ओडिशा में बिजली का निजीकरण किया। सिस्को कंपनी को डिस्कॉम सौंप दिया गया। तब उपभोक्ताओं को बेहतर सेवा का वादा किया गया था, लेकिन परिणाम विपरीत निकले। जब चक्रवाती तूफान जैसी भीषण आपदा आई, तब निजी कंपनी अपना लाभ सुरक्षित कर मैदान छोड़कर भाग गई। इसके बाद सरकारी तंत्र और कर्मचारियों ने ही विद्युत व्यवस्था बहाल की। यह ऐतिहासिक तथ्य जिसकी अनदेखी करना राजस्थान के नागरिकों के साथ अन्याय होगा। बाद में ओडिशा सरकार को वितरण प्रणाली को सरकारी नियंत्रण में लेना पड़ा, क्योंकि निजी कंपनी ने उपभोक्ताओं की सेवा, कर्मचारी और आपदा प्रधान प्रबंधन तीनों में विफल रही। ग्रामीण क्षेत्रों में आपूर्ति पर पड़ेगा असर समिति के जगदीश दाधीच ने बताया- हमारे सामने कई उदाहरण हैं। जब बिजली वितरण का काम निजी हाथों में दिया गया तो बिजली बिलों में भारी वृद्धि हुई है। इसका असर उपभोक्ताओं पर पड़ता है। ग्रामीण क्षेत्रों में बिजली आपूर्ति की गुणवत्ता और विश्वसनीयता भी घटेगी। आपदा की स्थिति में कंपनियां अपनी जिम्मेदारी से पीछे हट सकती है। जैसा उन्होंने ओडिशा में किया। इसके साथ ही बीपीएल परिवारों और छोटे उद्योगों पर भी बिजली दर बढ़ाने का प्रभाव पड़ेगा।