राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण के निर्देशानुसार पंचायत समिति किशनगढ़बास के सभागार में मानव-वन्यजीव संघर्ष विषय पर दो दिवसीय विशेष प्रशिक्षण एवं कार्यशाला का सफल समापन हुआ। कार्यक्रम का आयोजन जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के अध्यक्ष के मार्गदर्शन में किया गया, जिसकी अध्यक्षता प्राधिकरण के सचिव एवं मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट रनवीर सिंह ने की। त्वरित सहायता दिलाने में भूमिका निभाने का आह्लान कार्यक्रम के दौरान मजिस्ट्रेट रनवीर सिंह ने कहा- मानव और वन्यजीवों के बीच बढ़ता टकराव अब केवल पर्यावरणीय मुद्दा नहीं रहा, बल्कि यह एक गंभीर सामाजिक और आर्थिक चुनौती बन चुका है। इससे सबसे अधिक प्रभावित गरीब किसान और वन-आश्रित परिवार होते हैं। उन्होंने पैनल अधिवक्ताओं और पैरा लीगल वॉलंटियर्स (पीएलवी) से आह्वान किया कि वे केवल औपचारिकताओं तक सीमित न रहें, बल्कि पीड़ितों की “आवाज” बनकर उन्हें त्वरित सहायता दिलाने में सक्रिय भूमिका निभाएं। दस्तावेजों की प्रक्रिया समझाई उन्होंने बताया कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रत्येक नागरिक को सुरक्षित जीवन का अधिकार प्राप्त है। ऐसे में वन्यजीवों के हमलों से होने वाली मृत्यु, चोट या संपत्ति नुकसान की स्थिति में राज्य सरकार द्वारा देय मुआवजा समयबद्ध तरीके से दिलाना सुनिश्चित करना आवश्यक है। प्रशिक्षण में एसओपी के अनुसार 24 से 72 घंटे के भीतर घटना की सूचना वन विभाग को देने, मौके का पंचनामा तैयार करवाने और आवश्यक दस्तावेज जुटाने की प्रक्रिया विस्तार से समझाई गई। कार्यशाला में कुल सात मॉड्यूल्स पर चर्चा की गई, जिनमें मुआवजे की विभिन्न श्रेणियां प्रमुख रहीं। इसमें मृत्यु पर 5 से 25 लाख रुपए तक की सहायता, फसल नुकसान और पशुधन हानि के दावों की प्रक्रिया को विस्तार से बताया गया। सचिव ने स्पष्ट किया कि यदि मुआवजे में किसी प्रकार की देरी होती है, तो लोक अदालत और विधिक सेवा प्राधिकरण के माध्यम से पीड़ितों को शीघ्र न्याय दिलाया जा सकता है। समापन अवसर पर उन्होंने पीएलवी को संवेदनशीलता के साथ कार्य करने और ग्रामीण क्षेत्रों में जागरूकता फैलाने की अपील की, ताकि लोग वन्यजीवों के प्रति प्रतिशोध की भावना छोड़कर सह-अस्तित्व और कानूनी उपायों का मार्ग अपनाएं। इस दौरान डीएलएसए स्टाफ, अनुभवी अधिवक्ता एवं बड़ी संख्या में पैरा लीगल वॉलंटियर्स उपस्थित रहे।