कोटा के सिमलिया कस्बे में मुख्य बाजार के दोनों ओर प्रशासन ने अतिक्रमण के खिलाफ बड़ी कार्रवाई की है। इस अभियान के दौरान एलएनटी (LT) और जेसीबी मशीनों की मदद से कई पक्के मकानों और दुकानों के आगे के हिस्सों को तोड़ दिया गया। प्रशासन की इस अचानक कार्रवाई से स्थानीय लोगों और व्यापारियों में भारी आक्रोश देखा जा रहा है। कई परिवारों के सामने बेघर होने का संकट खड़ा हो गया है, वहीं व्यापारियों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा है। इधर, प्रशासन का तर्क है कि यह मामला पिछले 2 साल से स्थायी लोक अदालत में विचाराधीन था। अदालत के आदेशानुसार अतिक्रमण हटाकर रिपोर्ट पेश करनी थी, जिसके चलते यह कार्रवाई अमल में लाई गई है। । 200 अतिकर्मियों को चिन्हित किया, कई बार नोटिस दिया उपखंड अधिकारी दीगोद दीपक महावर ने बताया स्थायी लोक अदालत में पेश याचिका के आधार पर यह कार्रवाई की जा रही है। कोर्ट में अतिक्रमण तोड़कर रिपोर्ट पेश करनी थी। करीब 200 अतिकर्मियों को चिन्हित किया गया। उन्हें कई बार नोटिस दिए गए। हाल ही में 2 मई को आखिर बार नोटिस दिया गया था। मेन बाजार में दोनों साइड पर किसी ने रेंप बनाकर, टिन शेड लगाकर, मकान, दुकान, सीढ़िया, दीवार बनाकर अतिक्रमण किया हुआ था। कुछ लोगों ने मकान के आगे का हिस्सा निकाल रखा था। उसे जेसीबी व एलएनटी मशीन से तोड़ा। अतिक्रमण की कार्रवाई सुबह साढ़े 9 बजे से शुरू हुई जो शाम 5 बजे तक जारी रही। कार्रवाई में सिमलिया थाना पुलिस व लाइन से 70-75 जवान मौजूद रहे। 'जनहित के नाम पर बदले की कार्रवाई' जिला परिषद सदस्य और मूल याचिकाकर्ता गीता मेघवाल ने प्रशासन की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि साल 2024 में उन्होंने स्थायी लोक अदालत में जनहित याचिका केवल नाले की सफाई, अवैध निर्माण हटाने और बारिश में बाढ़ जैसे हालातों से राहत दिलाने के लिए लगाई थी। लेकिन प्रशासन ने इस याचिका का सहारा लेकर इसे व्यापक 'अतिक्रमण हटाओ अभियान' का रूप दे दिया। गीता मेघवाल का आरोप है कि सड़क के सेंटर से 40-40 फीट तक पक्के मकानों को मशीनों से ध्वस्त करना न तो नियोजित है और न ही न्यायसंगत। 'सरकारी भवनों को बचाया, गरीबों पर चला पीला पंजा' इस कार्रवाई में प्रशासन पर पक्षपात और भेदभावपूर्ण रवैया अपनाने के आरोप भी लग रहे हैं। याचिकाकर्ता के अनुसार, कई निजी दुकानों और यहाँ तक कि सरकारी स्कूलों की दीवारों को धराशायी कर दिया गया, लेकिन वहीं 40 फीट के दायरे में आने वाले सहकारी भवन को प्रशासन ने हाथ तक नहीं लगाया। आरोप है कि प्रशासन सरकार और रसूखदारों के दबाव में काम कर रहा है, जिससे निष्पक्षता पर सवाल उठ रहे हैं। बेघर हुए परिवार और ठप हुआ व्यापार प्रशासन की इस कार्रवाई से प्रभावित स्थानीय लोगों और व्यापारियों में जबरदस्त आक्रोश है। व्यापारियों का कहना है कि बिना किसी वैकल्पिक व्यवस्था या उचित समय दिए दुकानों को तोड़े जाने से उनका व्यापार पूरी तरह ठप हो गया है और उनके सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया है। कई परिवार बेघर हो गए हैं। स्थानीय जनता ने मांग की है कि प्रशासन को केवल कानूनी ही नहीं, बल्कि मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए निष्पक्ष जांच और राहत प्रदान करनी चाहिए। इधर याचिकाकर्ता एवं जिला परिषद सदस्य गीता मेघवाल ने कार्रवाई के तरीके पर सवाल उठाए हैं। गीता मेघवाल ने कहा साल 2024 में उन्होंने स्थाई लोक अदालत में जनहित याचिका लगाई थीएलएनटी जिसमें सिमलिया कस्बे में मुख्य सड़क व मुख्य सरकारी नाले पर हो रहे अतिक्रमण व अवैध निर्माण को हटाने व बारिश के दौरान कस्बे में बनने वाले बाढ़ जैसे हालात, समय पर नाला सफाई और निचली बस्तियों को राहत दिलाने की मांग की गई थी। लेकिन प्रशासन ने इसे व्यापक अतिक्रमण हटाओ अभियान का रूप दे दिया। सड़क के सेंटर से दोनों ओर 40-40 फीट तक निर्माण तोड़े जा रहे हैं और बड़ी बड़ी मशीनों से लोगों के पक्के मकानों को ध्वस्त किया जा रहा है। वर्तमान में जिस प्रकार से कार्रवाई की जा रही है वह नियोजित और न्यायसंगत नहीं लग रही है। उन्होंने प्रशासन पर भेदभावपूर्ण कार्रवाई करने के आरोप भी लगाए। उनका कहना है कि कई दुकानों और सरकारी स्कूलों की दीवारों को तोड़ा गया, जबकि सहकारी भवन भी 40 फीट दायरे में आने के बावजूद उसे नहीं हटाया गया। इससे यह स्पष्ट होता है कि प्रशासन सरकार के दबाव में कार्रवाई कर रहा है। इधर कार्रवाई से प्रभावित लोगों में भारी नाराजगी है। व्यापारियों का कहना है कि बिना पर्याप्त वैकल्पिक व्यवस्था के दुकानों को तोड़े जाने से उनके सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया है। स्थानीय लोगों ने प्रशासन से मांग की है कि आमजन और व्यापारियों को राहत देते हुए निष्पक्ष और मानवीय दृष्टिकोण से कार्रवाई की।