उपखंड क्षेत्र में मानसून की रफ्तार थमने और बारिश की लंबी खेंच से खरीफ फसलों पर संकट बढ़ गया है। कई दिनों से तेज धूप और गर्म हवाओं के कारण खेतों की नमी तेजी से घट रही है। बारिश पर निर्भर किसानों को सबसे ज्यादा परेशानी हो रही है। कई किसान खेत तैयार कर बुवाई के लिए इंतजार कर रहे हैं। तहसील कार्यालय के आंकड़ों के अनुसार 10 जून से 17 जुलाई तक ब्लॉक क्षेत्र में केवल 40 मिमी बारिश दर्ज हुई है। पिछले साल इसी अवधि में 286 मिमी बारिश हुई थी। इस साल मानसून की शुरुआत में कुछ स्थानों पर बारिश हुई थी, जिसके बाद किसानों ने बुवाई शुरू कर दी। इसके बाद बारिश रुक गई। कई खेतों में मिट्टी में दरारें दिखने लगी हैं। धान की फसल पर सबसे अधिक खतरा बताया जा रहा है। जिन किसानों ने धान की नर्सरी या रोपाई शुरू की है, वहां पौधे पीले पड़ने और सूखने लगे हैं। शुरुआती चरण में लगातार पानी की जरूरत के कारण धान की बढ़वार रुकने से उत्पादन पर असर पड़ने की आशंका है। सोयाबीन क्षेत्र की प्रमुख फसल है। पहले हुई बारिश के दौरान कई किसानों ने बुवाई कर दी थी, लेकिन अब नमी की कमी से पौधों का विकास धीमा हो गया है। बारिश नहीं होने पर पौधे छोटे रह सकते हैं और फलियां कम लगने से प्रति हेक्टेयर उत्पादन घट सकता है। उड़द और मूंग जैसी दलहनी फसलों में भी पीलेपन और वृद्धि रुकने की शिकायतें सामने आ रही हैं। मक्का और तिल की फसलें भी असिंचित क्षेत्रों में कमजोर पड़ रही हैं। कृषि विभाग के अनुसार जुलाई का दूसरा और तीसरा सप्ताह खरीफ फसलों के लिए अहम होता है। सूखा लंबा खिंचने पर दोबारा बुवाई या अतिरिक्त सिंचाई से लागत बढ़ सकती है। ^बारिश के नही होने से पूर्व में बुवाई की गई फसल सूखने लगी है। धान की बुवाई व रोपाई पर भी असर हो रहा है। जल्द बारिश हो तो किसानों की फसलों को जीवनदान मिल सकता है। पंकज मीणा, सहायक कृषि अधिकारी, किशनगंज