जयपुर में रिटायर्ड मेजर जनरल रंजन महाजन ने अपनी किताब 'कश्मीर इन द लाइन ऑफ फायर' पर अशोक क्लब में बात की। मेजर जनरल रंजन महाजन ने बताया- कैसे भारतीय सेना ने मुश्किल हालातों में भी हिम्मत और बहादुरी दिखाई। जयपुर के लेखक जगदीप सिंह के साथ बातचीत में महाजन ने कश्मीर में 15 साल की नौकरी के दौरान के अपने अनुभव बताए। उन्होंने बताया कि वहां कैसे संघर्ष होता है, कैसे लीडरशिप की जाती है और कैसे लोग मुश्किलों का सामना करते हैं। इस किताब को राजस्थान के पुलिस महानिदेशक राजीव शर्मा, लेफ्टिनेंट जनरल पदम सिंह शेखावत और अजय सिंघा ने मिलकर लॉन्च किया था। कश्मीर की वो सच्चाई जो हेडलाइंस में नहीं आती मेजर जनरल महाजन ने पुस्तक लिखने के पीछे अपनी प्रेरणा के बारे में बात करते हुए कहा- यह 'मेमॉयर' उनके अनुभवों को दर्ज करने और कश्मीर की एक ऐसी सच्ची तस्वीर पेश करने की इच्छा से उपजा है, जो केवल हेडलाइंस तक ही सीमित न हो। इस पुस्तक को लिखने की प्रक्रिया में कई वर्ष लगे, जिसमें पुरानी यादों को संजोना, अपने अनुभवों को व्यवस्थित रूप देना और पूरी सच्चाई व संवेदनशीलता सुनिश्चित करने के लिए गहन चिंतन शामिल था। विज़ुअल्स को रियल-टाइम में देख सकते हैं इस सत्र के दौरान पुस्तक के जिन अनोखे पहलुओं पर चर्चा हुई, उनमें से एक QR कोड्स का इस्तेमाल करना था, इनकी मदद से पाठक हेलीकॉप्टर ऑपरेशन्स समेत कई तरह के विज़ुअल्स को रियल-टाइम में देख सकते हैं। इस नई पहल का उद्देश्य पाठकों की दिलचस्पी बढ़ाना और सेना के कामकाज को ज्यादा गहराई से समझने का मौका देना है, खास तौर पर उन आम नागरिकों के लिए जो ऐसे माहौल से परिचित नहीं हैं। राष्ट्रीय राइफल्स की भूमिका पर विस्तार से चर्चा करते हुए उन्होंने समझाया कि इसकी शुरुआत एक विशेष 'काउंटर-इन्सर्जेंसी' बल के रूप में हुई थी, जिसे सेना की विभिन्न इकाइयों से जवानों को लेकर गठित किया गया था। जहां नियमित बटालियनें पारंपरिक युद्ध के लिए प्रशिक्षित होती हैं, वहीं राष्ट्रीय राइफल्स विशेष रूप से कश्मीर जैसे क्षेत्रों में लगातार चलने वाले आतंकवाद-रोधी अभियानों के लिए तैयार की गई है। इसके साथ ही, सेना के अभियानों से जुड़ी चुनौतियों पर बात करते हुए उन्होंने इस बात पर बल दिया कि सुरक्षित ठिकानों से बाहर हर मूवमेंट में काफी जोखिम होता है। चर्चा के दौरान कश्मीरी पंडितों के पीड़ायुक्त पलायन का भी जिक्र हुआ, जिसे उन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान देखी गई सबसे ज्यादा भावनात्मक रूप से कठिन घटनाओं में से एक बताया। उन्होंने संघर्ष के मानवीय मूल्य और विस्थापित समुदायों पर इसके लंबे समय तक रहने वाले प्रभाव के बारे में संवेदनशीलता के साथ बात की। कुछ अनसुने किस्सों को साझा करते हुए, उन्होंने कई घटनाओं का जिक्र किया, जिनमें एक ऐसे सैनिक की कहानी भी शामिल थी, जिसने अनजाने में सीमा पार कर ली थी और बाद में उसे जासूसी के लिए इस्तेमाल किया गया। यह घटना संघर्ष के जटिल मनोवैज्ञानिक पहलुओं को दर्शाती है। उन्होंने साधारण ग्रामीण पृष्ठभूमि से आने वाले उन सैनिकों की प्रेरणादायक कहानियां भी सुनाईं, जिन्होंने असाधारण साहस का प्रदर्शन किया और चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में नायक बनकर उभरे। सत्र का समापन एक दिलचस्प प्रश्नोत्तर सत्र के साथ हुआ, जिसमें श्रोताओं ने सैन्य रणनीति से लेकर कश्मीर में बदलती स्थिति जैसे विभिन्न विषयों पर लेखक के साथ संवाद किया। इससे पूर्व, स्वागत संबोधन अजय सिंघा ने दिया, जबकि सत्र का समापन तुषारिका सिंह द्वारा धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ।