कोटा शहर के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल एमबीएस की इमरजेंसी सेवाएं एक बार फिर सवालों के घेरे में हैं। 75 किलोमीटर दूर सड़क हादसे में घायल एक महिला को 108 एंबुलेंस जिंदा हालत में अस्पताल लेकर पहुंची, लेकिन समय पर इलाज नहीं मिलने से उसकी मौत हो गई। आरोप है कि गेट पर स्ट्रेचर तक उपलब्ध नहीं था। जब एंबुलेंसकर्मी स्ट्रेचर लेने गया तो स्टाफ ने पहले आधार कार्ड मांगा। इमरजेंसी बताने के बाद किसी तरह स्ट्रेचर मिला और मरीज को अंदर ले जाया गया। मृतका की पहचान रणोदिया निवासी उर्मिला बाई (55) के रूप में हुई है। जानकारी के अनुसार शनिवार सुबह करीब 8:45 बजे गणेशगंज क्षेत्र के पास सड़क दुर्घटना में वह गंभीर रूप से घायल हो गई थीं। 108 एंबुलेंस ने मौके पर पहुंचकर प्राथमिक उपचार दिया और पहले इटावा सीएचसी लेकर गई। वहां हालत गंभीर होने पर उन्हें कोटा के एमबीएस अस्पताल रेफर कर दिया गया। एंबुलेंस में तैनात EMT लीलाधर पारेता के अनुसार पूरे रास्ते महिला को ऑक्सीजन सपोर्ट दिया गया और फ्लूड चढ़ाया गया। करीब 11:30 बजे अस्पताल पहुंचने के बाद उम्मीद थी कि तुरंत इलाज मिलेगा, लेकिन इमरजेंसी गेट पर ही लापरवाही सामने आ गई। एंबुलेंसकर्मी के मुताबिक गेट पर स्ट्रेचर तक उपलब्ध नहीं था। जब एंबुलेंसकर्मी स्ट्रेचर लेने गया तो स्टाफ ने पहले आधार कार्ड मांगा। इमरजेंसी बताने के बाद किसी तरह स्ट्रेचर मिला और मरीज को अंदर ले जाया गया। अंदर मौजूद मेडिसिन रेजिडेंट ने इसे सर्जरी का केस बताते हुए सर्जरी डॉक्टर के नहीं होने की बात कही और इंतजार करने को कहा। इस दौरान महिला की हालत लगातार बिगड़ती रही। लीलाधर का आरोप है कि उसने बार-बार मरीज की हालत बिगड़ने की जानकारी दी। बीपी और ऑक्सीजन लेवल गिरने की बात कही, ऑक्सीजन और मॉनिटर लगाने की गुहार लगाई, लेकिन किसी ने ध्यान नहीं दिया। उल्टा उसे बाहर जाने के लिए कहा गया। कुछ देर बाद महिला ने दम तोड़ दिया। घटना की जानकारी मिलते ही अस्पताल अधीक्षक डॉ. धर्मराज मीणा और उपाधीक्षक डॉ. कर्णेश गोयल मौके पर पहुंचे। हालात देखकर अधीक्षक ने नाराजगी जताई, स्टाफ को फटकार लगाई और इमरजेंसी गेट पर स्ट्रेचर की व्यवस्था सुनिश्चित करने के निर्देश दिए। यह पहली घटना नहीं है। इससे पहले 23 मार्च को भी एक बुजुर्ग मरीज को गोद में अस्पताल लाया गया था, लेकिन इलाज शुरू होने से पहले उनकी मौत हो गई थी। एमबीएस अस्पताल की इमरजेंसी सेवाओं पर लगातार उठ रहे सवाल अब चिकित्सा व्यवस्था की सच्चाई उजागर कर रहे हैं। 75 किलोमीटर दूर से मरीज जिंदा पहुंच सकती है, लेकिन अस्पताल के गेट पर जान चली जाए, तो यह पूरे सिस्टम पर बड़ा सवाल है।