आदिवासी अंचल उदयपुर जिले में झाड़ोल-फलासिया क्षेत्र के किसान पारंपरिक फसलों से आगे बढ़ते हुए जर्मनी के प्रसिद्ध औषधीय पौधे कैमोमाइल की जैविक खेती कर रहे हैं। तीन वर्ष पहले शुरू हुई यह पहल आज न केवल किसानों की आय बढ़ा रही है, बल्कि आदिवासी क्षेत्र को औषधीय खेती की नई पहचान भी दिला रही है। झाड़ोल क्षेत्र के सड़ा सिगरी और तुरगढ़ गांव के करीब 15 किसानों ने इस खेती की शुरुआत की थी। देश में यूपी में पिछले 20 साल से कैमोमाइल की खेती की जा रही है। एक बीघा में 200 किलो सूखे फूलों का उत्पादन होता है, जिसे 500 रुपए प्रति किलो के हिसाब से खरीदा जाता है। फसल में फूल लगने के दौरान हर तीन दिन में फूलों को तोड़कर सूखा दिया जाता है। अक्टूबर में नर्सरी में बुवाई कर दी जाती है। फरवरी से अप्रैल तक फूल तोड़कर सुखाए जाते हैं। जून-जुलाई माह में फूलों की प्रोसेसिंग की जाती है। इसके बाद इन्हें हर्बल चाय बनाने वाली कंपनियों को भेजा जाता है। गुजरात मॉडल...250 किसानों की सोसायटी, निगरानी के लिए विशेषज्ञ इन औषधीय फसलों की खेती सोसायटी बनाकर की जा रही है। कदम ऑर्गेनिक सोसायटी के निदेशक केशव मेघवाल ने बताया कि अभी 250 किसान मिलकर खेती कर रहे हैं। गुजरात के किसानों को देखकर वहां जैसा सोसायटी मॉडल तैयार किया गया। इसमें फसलों की गुणवत्ता की लगातार विशेषज्ञों से निगरानी करवाई जाती है, जिससे क्वालिटी कंट्रोल अच्छा रहे। इसमें किसान विभिन्न प्रकार की औषधीय फसलों की खेती कर रहे हैं, जिससे उनकी आय में बढ़ोतरी हुई है। फिटनेस के प्रति जागरूक लोग इसे चाय के रूप में उपयोग करते कैमोमाइल मूल रूप से जर्मनी में पाया जाता है। यह एक औषधीय गुणों वाला पौधा है। सदियों से इसका इस्तेमाल कई बीमारियों के उपचार के लिए किया जाता है। इसमें कई शक्तिशाली एंटी-ऑक्सीडेंट्स पाए जाते हैं, जो शरीर को कई बीमारियों से कवच प्रदान करते हैं। कई अध्ययनों में भी यह पता चला है कि कैमोमाइल का सेवन सेहत के लिए बेहद फायदेमंद होता है। इसका इस्तेमाल चाय के तौर पर भी किया जा सकता है।