राजस्थान हाईकोर्ट (जोधपुर मुख्यपीठ) ने नागौर शहर की 'कालू खान की बाड़ी' से जुड़े 53 साल पुराने विवाद में अहम फैसला सुनाया। कोर्ट ने 15 जून 1972 को जारी की गई मूल सनद (अधिकार पत्र/पट्टा) को पूर्णतः वैध करार दिया है। जस्टिस मुन्नूरी लक्ष्मण की एकल पीठ ने आधी सदी से चले आ रहे इस कानूनी संघर्ष का पटाक्षेप करते हुए जिला कलेक्टर-कम-सेटलमेंट कमिश्नर और बीकानेर डिविजनल कमिश्नर द्वारा सनद रद्द करने के तमाम आदेशों को अधिकार क्षेत्र से बाहर और न्याय के सिद्धांतों के विरुद्ध मानते हुए खारिज कर दिया है। इस विवाद की जड़ें 1947 के भारत-पाक विभाजन से जुड़ी हैं। नागौर के दिल्ली गेट के बाहर स्थित 149 बीघा 8 बिस्वा कृषि भूमि (खसरा संख्या 558, 559, 560 और 560/1) के मूल खातेदार वली मोहम्मद और मोहम्मद रमजान काजी विभाजन के समय पाकिस्तान चले गए थे। इसके बाद 18 जनवरी 1951 को इस भूमि को 'एवैक्यूई संपत्ति' घोषित कर दिया गया और यह विस्थापित व्यक्ति (मुआवजा एवं पुनर्वास) अधिनियम, 1954 के तहत केंद्र सरकार के मुआवजा पूल का हिस्सा बन गई। इस भूमि पर वर्षों से काबिज कालू खान ने आवंटन के लिए आवेदन किया। तत्कालीन क्षेत्रीय आयुक्त द्वारा निर्धारित 2,524.24 रुपए की राशि जमा कराने के बाद 15 जून 1972 को सक्षम प्राधिकारी ने उनके पक्ष में विधिवत सनद जारी की। इसके बाद कालू खान ने भूमि के कुछ हिस्से तुलसीराम और भंवरलाल को पंजीकृत विक्रय पत्रों के जरिए बेच दिए थे। लेकिन महज चार महीने बाद ही नागौर के तत्कालीन जिला कलेक्टर ने स्वतः संज्ञान लेते हुए सनद को निरस्त कर कानूनी उलझनों का जो सिलसिला शुरू किया, वह तीन पीढ़ियों तक चलता रहा। वकीलों के तर्क और स्वतः संज्ञान पर कोर्ट की टिप्पणी हाईकोर्ट में याचिकाकर्ता सुखराम (गंगाराम सोलंकी के पुत्र), कालू खान के पुत्र इब्राहिम खान के उत्तराधिकारियों और अन्य क्रेताओं की ओर से वकील ने दलील दी कि जिला कलेक्टर-कम-सेटलमेंट कमिश्नर, जो स्वयं एक अपीलीय प्राधिकारी हैं, वे खुद ही अपीलकर्ता बनकर स्वतः संज्ञान कार्रवाई शुरू नहीं कर सकते। उन्होंने तर्क दिया कि एक न्यायाधीश स्वयं अभियोजक नहीं हो सकता, जो कि नैसर्गिक न्याय के सिद्धांत का खुला उल्लंघन है। दूसरी ओर, राज्य सरकार की ओर से सरकारी वकील ने दलील दी कि यह भूमि सरकारी है और नगर पालिका को आवंटित हो चुकी है। उन्होंने सनद जारी करने की प्रक्रिया में 'जल्दबाजी' को धोखाधड़ी का संकेत बताया। हालांकि, कोर्ट ने इन तर्कों को खारिज करते हुए कहा कि केवल त्वरित कार्यवाही को बिना ठोस सबूत के धोखाधड़ी नहीं कहा जा सकता। जिसके पास हक नहीं, वह दे नहीं सकता कोर्ट ने अपने फैसले में 'नेमो डाट क्वाड नॉन हैबेट' के कानूनी सिद्धांत का हवाला देते हुए कहा कि जब जमीन केंद्र सरकार के मुआवजा पूल में शामिल हो चुकी थी, तो राज्य सरकार का उस पर कोई मालिकाना हक नहीं बचा था। ऐसे में राज्य सरकार या नगर पालिका द्वारा उस भूमि को किसी तीसरे पक्ष को आवंटित करने का दावा कानूनी रूप से शून्य है। कोर्ट ने यह भी पाया कि नगर पालिका और सरकार ने अलग-अलग चरणों में विरोधाभासी बयान दिए। कभी जमीन को 140 बीघा बताया, कभी केवल एक खसरा नंबर और कभी उसे गैर-मुमकिन भूमि करार दिया। कोर्ट ने इन दावों को रिकॉर्ड-विहीन और औचित्यहीन माना। सनद पूरी तरह वैध थी, रद्द करने की प्रक्रिया मर्यादाओं के खिलाफ जस्टिस मुन्नूरी लक्ष्मण ने स्पष्ट किया कि वर्ष 1972 की सनद पूरी तरह वैध थी और इसे रद्द करने के लिए अपनाई गई प्रशासनिक प्रक्रिया संवैधानिक मर्यादाओं के खिलाफ थी।फैसले से न केवल कालू खान के उत्तराधिकारियों, बल्कि उन सैकड़ों लोगों को भी राहत मिली है जो इस भूमि पर वर्षों से बसे हुए थे या जिन्होंने वहां निवेश किया था। हाईकोर्ट ने साफ किया कि कानून के दायरे से बाहर जाकर की गई कोई भी प्रशासनिक कार्यवाही, चाहे वह कितनी भी पुरानी क्यों न हो, उसे वैध नहीं ठहराया जा सकता।