जयपुर आरटीओ प्रथम में 7 डिजिट नंबर आवंटन घोटाले में एक के बाद एक चौंकाने वाले खुलासे हो रहे हैं। जांच में सामने आया है कि गैर-परिवहन शाखा में कार्यरत बाबू सुरेश तनेजा ने महज 6 महीने में 633 नंबरों का बैकलॉग, वेरिफिकेशन और अप्रूवल कर दिया। इनमें 88 नंबर ऐसे हैं, जो विभाग के आधिकारिक रिकॉर्ड में कभी थे ही नहीं। यह पूरा काम नवंबर 2024 से अप्रैल 2025 के बीच हुआ। चौंकाने वाली बात यह है कि तनेजा को बैकलॉग, वेरिफिकेशन और अप्रूवल जैसे तीनों स्तर की जिम्मेदारी दे दी गई थी, जबकि नियमों के अनुसार बैकलॉग का काम आईए यानी सूचना सहायक, वेरिफिकेशन बाबू और अप्रूवल डीटीओ स्तर पर होना चाहिए। जांच में यह भी सामने आया कि इससे पहले भी कर्मचारियों को सभी अधिकार दिए गए थे। करीब 11 साल में 7 आरटीओ रहे, लेकिन किसी की इस पर नजर नहीं गई। जयपुर से दूसरे जिलों तक पहुंचा नेटवर्क यह घोटाला केवल जयपुर तक सीमित नहीं रहा। सलूंबर, सवाई माधोपुर और झुंझुनूं सहित अन्य जिलों तक फर्जी नंबरों का नेटवर्क फैला हुआ था। RNB-0055 नंबर को फर्जी तरीके से रिकॉर्ड में जोड़कर जोधपुर के नाम NOC जारी की गई। बाद में यह नंबर सलूंबर में दूसरे व्यक्ति के नाम ट्रांसफर कर दिया गया। इसी तरह जयपुर आरटीओ से करीब 44 नंबर अन्य जिलों को NOC के जरिए ट्रांसफर किए गए। 39 अधिकारी-कर्मचारियों पर एफआईआर मामले में 39 अधिकारी-कर्मचारियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई है। इनमें डीटीओ स्तर से लेकर बाबू और निरीक्षक तक शामिल हैं। इसमें संजय शर्मा, रामकृष्ण चौधरी, धर्मपाल आसलीवाल, अमित तनवानी, मुकेश कुमार मीणा, विश्वास कुमार, जगदीश प्रसाद यादव, कपिल भाटिया, इंदू, निधि गौतम, सुरेंद्र सिंह गुलिया, रमेश पांडे जैसे नाम शामिल हैं। हालांकि इनमें से कई ने कोर्ट से स्टे ले रखा है। जहांगीर दो दिन की रिमांड पर, आरटीओ से जब्त होगा रिकॉर्ड प्रादेशिक परिवहन कार्यालय (आरटीओ प्रथम) में सामने आए बैकलॉग एंट्री घोटाले में अब एक और चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। जांच में सामने आया है कि ऐसे वाहन नंबर भी जारी कर दिए गए, जो कभी परिवहन विभाग द्वारा आवंटित ही नहीं किए गए थे। बता दें कि बाबू जहांगीर खान को 25 अप्रैल तक रिमांड पर लिया था, जिसे शनिवार को फिर से कोर्ट में पेश किया गया। जिसके बाद उसे अब 27 अप्रैल तक फिर से रिमांड पर लिया है। जिसे पूछताछ के बाद फिर से कोर्ट में पेश किया जाएगा। अब पुलिस परिवहन कार्यालय से वाहनों का रिकॉर्ड जब्त करना शुरू कर दिया है। पुलिस ने बताया कि 1989 में तीन अक्षरों वाली पुरानी पंजीयन सीरीज को समाप्त कर दिया गया था। जांच में सामने आया कि इन नंबरों को ‘फैंसी नंबर’ बनाकर बेचा गया, जबकि विभागीय रिकॉर्ड में इनका कोई अस्तित्व ही नहीं था। पुलिस और विभागीय जांच में सामने आया है कि इस पूरे खेल में अधिकारियों, कर्मचारियों और दलालों की मिलीभगत रही। बैकलॉग एंट्री के जरिए सिस्टम में इन नंबरों को डाला गया और बाद में इन्हें अन्य वाहनों पर ट्रांसफर कर दिया गया। 2129 नंबर संदिग्ध, सिर्फ 250 RC निलंबित: परिवहन विभाग की जांच में करीब 2129 नंबरों का गलत तरीके से आवंटन सामने आया है, लेकिन अब तक केवल 250 वाहनों की RC निलंबित की गई है। बाकी मामलों में कार्रवाई लंबित है।